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Afzal Guru and Maqbool Bhatt: दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें तिहाड़ जेल परिसर से आतंकियों मोहम्मद अफजल गुरु और मोहम्मद मकबूल भट्ट की कब्रों को हटाने की मांग की गई थी। याचिका ‘विश्व वैदिक सनातन संघ’ और जितेंद्र सिंह नामक व्यक्ति की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि जेल परिसर में बनी इन कब्रों का अस्तित्व अवैध, असंवैधानिक और जनहित के खिलाफ है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में मौलिक या वैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का कोई ठोस आधार नहीं दिखाया गया। अदालत की टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ताओं ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे मंजूर कर लिया गया।
आतंकवाद के महिमामंडन का आरोप
याचिका में कहा गया था कि तिहाड़ जेल में बनी कब्रें वहां की सुरक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा हैं। आरोप लगाया गया कि इन कब्रों की मौजूदगी से जेल परिसर कट्टरपंथी तत्वों के लिए "तीर्थस्थल" जैसा स्थान बन गया है, जहां दोषी आतंकवादियों का महिमामंडन किया जाता है। याचिका में यह भी कहा गया कि अजमल कसाब और याकूब मेमन जैसे आतंकवादियों के शवों को गुप्त रूप से दफनाया गया था ताकि इस तरह की स्थिति न पैदा हो, लेकिन अफजल गुरु और मकबूल भट्ट के मामले में ऐसा नहीं किया गया।
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अदालत का रुख और आगे की संभावना
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि किसी भी जनहित याचिका में राहत पाने के लिए संवैधानिक या कानूनी अधिकारों के उल्लंघन का उल्लेख होना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में जेल परिसर के भीतर दफनाने या दाह संस्कार करने पर कोई रोक नहीं है। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे नए तथ्यों और आंकड़ों के साथ याचिका दोबारा दायर करेंगे। गौरतलब है कि मकबूल भट्ट को 1984 में और अफजल गुरु को 2013 में तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी और दोनों को वहीं दफनाया गया था।