
नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में जब भारत की युवा बल्लेबाज प्रतिका रावल ने न्यूजीलैंड के खिलाफ अपना पहला शतक जड़ा, तो पूरा मैदान प्रतिका-प्रतिका के नारों से गूंज उठा क्योंकि सिर्फ एक बल्लेबाज की पारी नहीं थी, बल्कि एक पिता के सपनों का साकार होना था. दिल्ली की इस हिंद की शेरनी ने 134 गेंदों पर 122 रनों की शानदार पारी खेलकर टीम इंडिया को सेमीफाइनल में पहुंचा दिया. इस जीत के साथ ही महिला क्रिकेट जगत में उनके नाम का भूचाल आ गया. मैदान में मौजूद उनके पिता प्रदीप रावल की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े, क्योंकि जिस बेटी को उन्होंने अपनी छत पर अभ्यास कराकर तैयार किया था, वही अब पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन कर रही थी.
फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं कहानी !
प्रतिका की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं. महामारी के दिनों में जब सबकुछ थम गया था, तब उनके पिता ने घर की छत को ही नेट प्रैक्टिस ग्राउंड बना दिया था. प्रदीप खुद तेज गेंदबाज रह चुके हैं और रोजाना अपनी बेटी को 400 से 500 गेंदों का थ्रोडाउन देते थे. उन्होंने कहा था एक दिन मेरी बेटी भारत का नाम ऊंचा करेगी और आज वही बात सच हो गई. न्यूजीलैंड के खिलाफ उनकी पारी ने साबित कर दिया कि मेहनत और भरोसा कभी व्यर्थ नहीं जाता. उस मैच में उनकी बल्लेबाजी इतनी सधी हुई थी कि कीवी गेंदबाजों के पास कोई जवाब नहीं था. हर चौका और छक्का मानो एक पिता के सपने की गूंज थी जो अब सच बन चुकी थी.
ऑस्ट्रेलिया की दिग्गज लिंडसे रीलर की बराबरी !
प्रतिका का सफर दिल्ली के रोहतक रोड जिमखाना से शुरू हुआ, जहां उनके कोच श्रवण कुमार ने पहली बार उनकी प्रतिभा को पहचाना. वही श्रवण जिन्होंने इशांत शर्मा और हर्षित राणा जैसे क्रिकेटरों को तैयार किया. प्रतिका उनकी अकादमी में प्रशिक्षण लेने वाली पहली लड़की थीं. शुरू में लड़कों के साथ खेलना उनके लिए चुनौती थी, लेकिन उनके दमदार स्ट्रोक्स और अनुशासित खेल ने सभी को प्रभावित किया. घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद टीम इंडिया में जगह पाने में उन्हें वक्त लगा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आज वो वनडे में 1,000 रन पूरे करने वाली सबसे तेज भारतीय महिला बल्लेबाज बन चुकी हैं सिर्फ 23 पारियों में ये रिकॉर्ड हासिल कर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की दिग्गज लिंडसे रीलर की बराबरी कर ली.
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लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा बनी
आज प्रतिका रावल सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा बन गई हैं. कभी घर की छत पर खेलकर सपनों की नींव रखने वाली ये दिल्ली गर्ल अब अंतरराष्ट्रीय मैदानों में अपनी दहाड़ से विरोधियों को डराने लगी है. पिता प्रदीप रावल ने कहा जब उसने तीन साल की उम्र में बल्ला उठाया था, तब ही जान गया था कि ये बेटी देश का गौरव बनेगी. अब वही सपना साकार हो चुका है. भारत की जीत के बाद जब प्रतिका ने अपने पिता को गले लगाया, तो वो पल हर भारतीय के दिल में अमर हो गया.