
आज पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार खुशी और प्यार के साथ मनाया जा रहा है. बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना कर रही हैं. लेकिन भारत में एक ऐसा वर्ग भी है, जो इस दिन खुशी के साथ-साथ गहरी उदासी महसूस कर रहा है. यह हैं पाकिस्तान से आए वो शरणार्थी जो यहां तो सुरक्षित हैं, लेकिन उनके अपने भाई-बहन पाकिस्तान में ही रह गए हैं.
पाकिस्तान से दूर, लेकिन दिल वहीं अटका
जैसलमेर और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में पाक विस्थापित रह रहे हैं. ये लोग पाकिस्तान में अत्याचार झेलने के बाद भारत आकर बसे, लेकिन परिवार के कई सदस्य वहीं छूट गए. खासकर रक्षाबंधन जैसे मौके पर इनकी आंखें नम हो जाती हैं, क्योंकि वे अपने भाइयों-बहनों के पास नहीं पहुंच पाते. भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध बिगड़ने और यात्रा पर पाबंदियों के कारण इनका मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है. कई लोग सोचते हैं कि शायद अपने जीवन में दोबारा अपने भाई-बहनों को देख भी पाएंगे या नहीं.
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कसुंबी की कहानी – पांच भाई पाकिस्तान में
कसुंबी नाम की महिला एक साल पहले पति और बच्चों के साथ पाकिस्तान से जैसलमेर आई. वह पांच भाइयों की इकलौती बहन है. सभी भाई पाकिस्तान में हैं. फोन पर बात करते समय उसका गला भर आता है और रक्षाबंधन पर तो यह दर्द और बढ़ जाता है.
अकलो – बेटी पाकिस्तान में, बेटे भारत में
अकलो 20 साल पहले पाकिस्तान से जैसलमेर आई थी. उसके 9 बच्चे हैं जिनमें सबसे बड़ी बेटी पाकिस्तान में रहती है, जबकि बाकी आठ बेटे जैसलमेर में हैं. बेटी से बात होते ही उसकी आंखें भर आती हैं. बेटों को भी अपनी बहन के आने का इंतजार रहता है.
हरचंद और केसराराम – बहनों से दूर
70 साल के हरचंद 3 साल पहले पाकिस्तान से आए. उनकी चार बहनें और एक बेटा पाकिस्तान में हैं. इस बार भी उनकी कलाई राखी के बिना सूनी रही. 50 साल के केसराराम 12 साल पहले भारत आए और अब नागरिक भी बन चुके हैं, लेकिन उनकी तीन बेटियां और तीन बहनें पाकिस्तान में हैं. रक्षाबंधन के दिन उन्हें अपनों की दूरी सबसे ज्यादा खलती है.
ये सभी पाक विस्थापित सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि उनके पाकिस्तान में रह रहे भाइयों और बहनों को भी भारत में लाने की व्यवस्था हो, ताकि वो अपने परिवार के साथ त्योहार मना सकें.