भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये देने का फैसला किया है। यह आरबीआई के 90 साल के इतिहास का सबसे बड़ा सरप्लस ट्रांसफर माना जा रहा है। आरबीआई हर साल अपने मुनाफे का एक हिस्सा सरकार को देता है, क्योंकि सरकार ही उसकी एकमात्र शेयरधारक है। इस बार घोषित रकम ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और आर्थिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है।
इतना पैसा आया कहां से?
आरबीआई की इस बड़ी कमाई के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण रुपये की कमजोरी माना जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्य रुपये में बढ़ गया। इसके अलावा विदेशी निवेशों से ब्याज आय, सरकारी बॉन्ड और अन्य वित्तीय गतिविधियों से भी केंद्रीय बैंक की कमाई में इजाफा हुआ।
सरकार को क्या होगा फायदा?
यह रकम सरकार के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है। वैश्विक तनाव और बढ़ती सब्सिडी के बीच यह पैसा सरकार के खर्चों को संभालने में मदद कर सकता है। इससे सरकार को बाजार से कम कर्ज लेना पड़ सकता है। इसका असर ब्याज दरों और आर्थिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।
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आपकी जेब पर क्या असर?
आम लोगों के लिए इसका असर सीधे और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से दिख सकता है। अगर सरकार को कम कर्ज लेना पड़ेगा तो ऋण बाजार पर दबाव कम रह सकता है। इससे गृह ऋण और वाहन ऋण जैसी सेवाओं की ब्याज दरों पर राहत मिलने की संभावना बन सकती है। हालांकि ज्यादा नकदी से महंगाई का जोखिम भी बना रह सकता है।
उठ रहे हैं नए सवाल
लगातार बढ़ते डिविडेंड के बाद अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या आरबीआई सरकार के लिए आय का स्थायी स्रोत बनता जा रहा है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि देने के बजाय केंद्रीय बैंक को अपने रिजर्व और जोखिम कोष को और मजबूत करना चाहिए।
बहस अभी जारी है
आर्थिक विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर अलग-अलग है। कुछ इसे सरकार के लिए राहत मान रहे हैं तो कुछ इसे भविष्य की तैयारी से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि इस रिकॉर्ड डिविडेंड ने देश की अर्थव्यवस्था और केंद्रीय बैंक की भूमिका को लेकर एक नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है।