हर साल 26 जनवरी को देश अपना गणतंत्र दिवस मनाता है। इसी दिन 1950 में संविधान लागू हुआ था। साल 2026 में देश 77वां गणतंत्र दिवस मनाएगा। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाली परेड सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि देश की सैन्य ताकत, अनुशासन और एकता का प्रदर्शन होती है। राष्ट्रपति की मौजूदगी में होने वाली यह परेड पूरी दुनिया का ध्यान खींचती है।
परेड के पीछे छिपी महीनों की मेहनत
कर्तव्य पथ पर जवानों की एक जैसी चाल और चमकते हथियार देखकर सब कुछ आसान लगता है, लेकिन इसके पीछे महीनों की कड़ी तैयारी होती है। जवानों का अभ्यास जुलाई से शुरू हो जाता है। पहले वे अपने रेजिमेंट केंद्रों में अभ्यास करते हैं और दिसंबर तक दिल्ली पहुंचते हैं। हर जवान करीब 600 घंटे की सख्त ट्रेनिंग पूरी करता है।
हर सेकंड तय, गलती की कोई जगह नहीं
गणतंत्र दिवस परेड का हर पल पहले से तय होता है। समय में थोड़ी सी चूक भी बड़ी गलती मानी जाती है। 26 जनवरी की सुबह राष्ट्रपति के पहुंचते ही परेड शुरू होती है। राष्ट्रध्वज को सलामी दी जाती है और 21 तोपों की सलामी होती है। खास बात यह है कि यह सलामी 7 तोपों से तीन राउंड में दी जाती है।
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जवानों की चार स्तर की सुरक्षा जांच
परेड में शामिल होने से पहले जवानों को कड़ी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। उनकी पहचान, पृष्ठभूमि और सेवा रिकॉर्ड की गहन जांच होती है। हथियारों को भी पूरी तरह जांचा जाता है ताकि उनमें कोई भी असली गोली न हो। सुरक्षा में जरा सी भी ढील नहीं दी जाती।
हथियार और सैन्य वाहनों की अलग परीक्षा
परेड में शामिल टैंक, तोप और बख्तरबंद वाहनों के लिए इंडिया गेट के पास विशेष शिविर लगाए जाते हैं। यहां हर उपकरण की तकनीकी और सुरक्षा जांच होती है। रिहर्सल के दौरान हर टुकड़ी करीब 12 किलोमीटर तक मार्च करती है, ताकि परेड के दिन कोई कमी न रह जाए।
परेड के दिन जवानों का कठिन दिनचर्या
परेड वाले दिन जवान तड़के करीब दो बजे तैयार हो जाते हैं और तीन बजे तक कर्तव्य पथ पहुंच जाते हैं। झांकियां तय रफ्तार से चलती हैं ताकि दर्शक हर दृश्य साफ देख सकें। पूरे मार्ग पर विशेषज्ञ मौजूद रहते हैं, जो लगभग 200 मानकों पर हर टुकड़ी का मूल्यांकन करते हैं। यही वजह है कि परेड पूरी दुनिया में अनुशासन की मिसाल बनती है।