भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर को पार कर गया, जो अब तक का सबसे निचला रिकॉर्ड है। इसका मतलब यह है कि एक डॉलर खरीदने के लिए अब 90 रुपये से ज्यादा खर्च करने होंगे। रुपये की वैल्यू में लगातार गिरावट का असर सीधे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाला है। क्योंकि जब रुपये की कीमत कम होती है, तो आयातित सामान महंगा हो जाता है, और इसका प्रभाव गैस सिलेंडर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोल-डीजल तक दिखाई देता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट ने घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है और आने वाले दिनों में कई चीजें और महंगी हो सकती हैं।
सबसे बड़ा असर ईंधन और खाद्य तेल पर
रुपया कमजोर होने से सबसे बड़ा असर ईंधन और खाद्य तेल पर पड़ेगा। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और खाने का तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में डॉलर महंगा होने से पेट्रोल, डीजल, LPG और कुकिंग ऑयल के दाम बढ़ना तय है। इससे उन उद्योगों की लागत भी बढ़ेगी जो तेल पर निर्भर हैं, जिसका असर आम घरों के बजट पर पड़ेगा। इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे मोबाइल, लैपटॉप, एसी और फ्रिज में इस्तेमाल होने वाले कई पार्ट्स भी विदेशों से आते हैं, इसलिए इनके दाम भी बढ़ने के आसार हैं। सोने और चांदी के आयात महंगा होने से इनके आभूषणों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, जिससे शादी-ब्याह के मौसम में लोगों की जेब और हल्की होगी।
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युवाओं पर गिरावट का बड़ा असर
विदेशों में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों और वहां जाने की योजना बना रहे युवाओं पर इस गिरावट का बड़ा असर पड़ रहा है। ट्यूशन फीस डॉलर में तय होती है, इसलिए रुपये कमजोर होने से पढ़ाई का खर्च लाखों में बढ़ जाएगा। पहले जो फीस 40 लाख रुपये में आती थी, वह अब 45 लाख तक पहुंच चुकी है। इतना ही नहीं, शिक्षा लोन की EMI भी बढ़ जाएगी, जिससे छात्रों और माता-पिता की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इलेक्ट्रिक वाहनों और लग्जरी कारों का आयात भी महंगा हो जाएगा, क्योंकि इनमें कई जरूरी पार्ट्स बाहर से आते हैं।
तेज गिरावट के पीछे कई वजहें
रुपये में आई तेज गिरावट के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बनी अनिश्चितता, अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर बढ़ाया गया टैक्स, और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकालना महत्वपूर्ण कारण हैं। साल 2025 में अब तक निवेशक 17 अरब डॉलर से अधिक बाहर निकाल चुके हैं, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ गया है। वहीं IMF द्वारा भारत के एक्सचेंज रेट सिस्टम में की गई नई श्रेणीकरण से संकेत मिलते हैं कि RBI अब रुपये को पहले की तरह सक्रिय रूप से नहीं रोक रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक माहौल नहीं सुधरा तो रुपये पर और दबाव बन सकता है।