मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। बुधवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। विदेशी निवेशकों की निकासी और डॉलर की मजबूती के कारण रुपया गिरकर 92.58 तक पहुंच गया। एक्सपर्ट के अनुसार वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर जा रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
तेल की कीमतों ने बढ़ाई मुश्किलें
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। तेल महंगा होने से आयात का खर्च बढ़ता है और इसका सीधा असर रुपये की कीमत पर पड़ता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो रुपये पर और दबाव पड़ सकता है और कीमतों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
बाजार में लगातार गिरावट का ट्रेंड
हाल के दिनों में रुपया लगातार कमजोर होता दिख रहा है। मंगलवार को भी यह अपने पिछले निचले स्तर के करीब पहुंचा था और अब नया रिकॉर्ड बना दिया है। इंटरबैंक बाजार में भी रुपये की चाल कमजोर रही और यह धीरे-धीरे गिरते हुए नए स्तर पर पहुंच गया। एक्सपर्ट बताते हैं कि बाजार में नकारात्मक माहौल और विदेशी पूंजी का बाहर जाना इस गिरावट की बड़ी वजह है।
ये भी पढ़ें : Iran तनाव के बीच भारत की बड़ी तैयारी, गैस संकट से बचने के लिए बना 600 करोड़ का प्लान
आगे और गिर सकता है रुपया
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने भी रुपये को लेकर चिंता जताई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो रुपया 95 के स्तर तक भी पहुंच सकता है। एक्सपर्ट का कहना है कि वैश्विक तनाव और तेल की कीमतें रुपये की दिशा तय करेंगी। अगर इन दोनों में सुधार नहीं होता है, तो आने वाले समय में और कमजोरी देखने को मिल सकती है।
इकॉनमी पर क्या होगा असर
रुपये की गिरावट का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। आयात महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। एक्सपर्ट के अनुसार सरकार और केंद्रीय बैंक इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर कदम उठा सकते हैं, ताकि असर को कम किया जा सके।
आगे क्या हो सकती है रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार आर्थिक नीतियों के जरिए इस स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय बैंक बाजार में तरलता बनाए रखने और स्थिरता लाने के लिए कदम उठा सकता है। हालांकि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक हालात कब तक सामान्य होते हैं। फिलहाल सभी की नजर इस पर टिकी है कि आने वाले दिनों में रुपया किस दिशा में जाता है।