जब चारों तरफ विकेट गिर रहे हों और हार सामने खड़ी हो, तब जो खिलाड़ी टीम का हाथ थाम ले वही असली नायक होता है। विजय हजारे ट्रॉफी में ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब महाराष्ट्र की टीम मुश्किल में थी और कप्तान ऋतुराज गायकवाड़ अकेले मोर्चा संभाले खड़े थे। इस पारी ने न सिर्फ मैच की दिशा बदली, बल्कि क्रिकेट जगत में नई बहस भी छेड़ दी।
पचास से पहले टूट गई टीम
गोवा के खिलाफ मुकाबले में महाराष्ट्र की शुरुआत बेहद खराब रही। सिर्फ बावन रन पर आधी से ज्यादा टीम पवेलियन लौट चुकी थी। ड्रेसिंग रूम में सन्नाटा था और दर्शकों को हार तय नजर आ रही थी। ऐसे हालात में कप्तान ऋतुराज गायकवाड़ ने जिम्मेदारी ली और तय किया कि मैदान छोड़ना आसान नहीं होगा।
संघर्ष से जन्मी शतकीय पारी
ऋतुराज गायकवाड़ ने एक छोर संभालते हुए धैर्य के साथ बल्लेबाजी की। उन्होंने एक सौ इकतीस गेंदों पर एक सौ चौंतीस रन बनाए। यह पारी सिर्फ शतक नहीं थी, बल्कि हालात से लड़ने की मिसाल थी। उन्होंने समझदारी से खेलते हुए टीम को सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाया और यह दिखा दिया कि नेतृत्व क्या होता है।
इतिहास में दर्ज हुआ नया अध्याय
इस पारी के दौरान ऋतुराज ने लिस्ट ए क्रिकेट में सबसे तेज पांच हजार रन पूरे कर लिए। इससे पहले यह उपलब्धि पाकिस्तान के बल्लेबाज बाबर आजम के नाम थी। बाबर ने यह मुकाम सत्तानवे पारियों में हासिल किया था, जबकि ऋतुराज ने पंचानवे पारियों में ही इतिहास बदल दिया। यह उपलब्धि भारतीय क्रिकेट के लिए खास मानी जा रही है।
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टीम को मिली नई जान
ऋतुराज की बदौलत महाराष्ट्र की टीम पचास ओवर में सात विकेट पर दो सौ उनचास रन तक पहुंच सकी। जिस स्थिति में टीम थी, वहां तक पहुंचना किसी जीत से कम नहीं था। कप्तान की इस पारी ने बाकी खिलाड़ियों को भी भरोसा दिया कि मुश्किल हालात में भी मैच लड़ा जा सकता है।
फिर भी सवाल क्यों बाकी हैं
इतना शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद ऋतुराज गायकवाड़ को विदेशी दौरे पर लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। खासकर न्यूजीलैंड जैसे अहम दौरे में उनका नाम बाहर रहना कई सवाल खड़े करता है। घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद भी मौका न मिलना चयन नीति पर बहस को और तेज कर रहा है।