हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रही। शुक्रवार सुबह बाजार खुलते ही निवेशकों में बेचैनी दिखाई दी और दोनों प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ खुले। सेंसेक्स करीब 365 अंकों की गिरावट के साथ 79,658 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 100 से ज्यादा अंक फिसलकर 24,600 के आसपास कारोबार करता नजर आया। बाजार में यह गिरावट मुख्य रूप से वैश्विक हालात और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण देखी जा रही है।
कुछ शेयरों में दिखी हल्की मजबूती
हालांकि बाजार में गिरावट के बीच कुछ कंपनियों के शेयरों में हल्की तेजी भी देखने को मिली। टेक महिंद्रा, इंफोसिस, रिलायंस, ट्रेंट, सन फार्मा, एनटीपीसी, टीसीएस और बीईएल जैसे शेयर हरे निशान में कारोबार करते दिखाई दिए। इन कंपनियों के शेयरों ने गिरते बाजार में कुछ हद तक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन कुल मिलाकर बाजार का रुख कमजोर ही बना रहा।
अमेरिकी बाजारों में भी भारी गिरावट
मध्य पूर्व में जारी तनाव का असर अमेरिकी शेयर बाजार पर भी साफ नजर आया। गुरुवार को वॉल स्ट्रीट के प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज में करीब 784 अंकों की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। वहीं एस एंड पी 500 और नैस्डैक सूचकांक भी नीचे बंद हुए। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और युद्ध जैसे हालातों ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है।
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एशियाई बाजारों पर भी पड़ा असर
अमेरिकी बाजारों की कमजोरी का असर एशिया के बाजारों पर भी देखने को मिला। शुक्रवार सुबह कई एशियाई शेयर बाजार गिरावट के साथ खुले। जापान का निक्केई और दक्षिण कोरिया का कोस्पी दोनों कमजोर रहे। वहीं हांगकांग के बाजार में भी दबाव दिखाई दिया। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा फिलहाल कमजोर पड़ा है।
विदेशी निवेशकों ने की बड़ी बिकवाली
इन हालातों के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पैसे निकाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 3752 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। हालांकि घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभालने की कोशिश की और लगभग 5153 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इससे बाजार में गिरावट कुछ हद तक नियंत्रित रही।
अमेरिका के फैसले से भारत को राहत
इस बीच भारत के लिए एक राहत की खबर भी सामने आई है। अमेरिका ने भारत को 30 दिनों के लिए विशेष अनुमति दी है, जिसके तहत भारतीय रिफाइनरियां रूस से बिना अतिरिक्त शुल्क के कच्चा तेल खरीद सकेंगी। इससे भारत को तेल सस्ती कीमतों पर मिल सकेगा और मध्य पूर्व में जारी संकट का असर देश की ऊर्जा जरूरतों पर कुछ हद तक कम पड़ सकता है।