प्रदेश में एसआइआर अभियान के दौरान बीएलओ से जुड़ी आत्महत्या और आत्महत्या के प्रयास की खबरों ने पहले ही सियासी और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था। अब इसी अभियान से जुड़ा एक नया मामला सामने आया है। इस बार चर्चा बीएलओ नहीं, बल्कि निर्वाचन कार्यालयों में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस के आवेदन सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर काम का दबाव कितना बढ़ चुका है।
मेरठ से सामने आया बड़ा मामला
मेरठ में जिला निर्वाचन कार्यालय से जुड़ी एक खबर ने सभी को चौंका दिया है। यहां सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी आलोक शर्मा और वरिष्ठ सहायक फैजान जैदी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया है। दोनों के आवेदन सामने आते ही प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। माना जा रहा है कि यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से बने दबाव का नतीजा है।
दूसरे जिलों से भी मिल रहे संकेत
मेरठ ही नहीं, बल्कि प्रदेश के एक अन्य जनपद से भी सहायक निर्वाचन अधिकारी द्वारा वीआरएस का आवेदन देने की सूचना सामने आई है। हालांकि उस जिले का नाम अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि यह मामला अकेला नहीं है। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या निर्वाचन से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी अब इस काम को संभाल पाने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।
मुख्य निर्वाचन कार्यालय ने मांगी रिपोर्ट
इन आवेदनों के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने तुरंत संज्ञान लिया है। उप मुख्य निर्वाचन अधिकारी अमित सिंह ने जिला निर्वाचन अधिकारी से दोनों अधिकारियों की सेवाओं से जुड़ी जानकारी मांगी है। इसमें कुल पांच बिंदुओं पर विवरण तलब किया गया है। इसमें उनकी जनपदवार सेवा अवधि, किसी भी तरह की अनुशासनिक कार्रवाई का ब्योरा, सेवा पुस्तिका की प्रमाणित प्रति और पिछले पांच वर्षों का अदेयता प्रमाणपत्र शामिल है।
इसे भी पढ़ें : आसमान में आने वाला है सबसे बड़ा बदलाव, छठी पीढ़ी के फाइटर जेट कैसे बदल देंगे जंग का पूरा खेल
काम का दबाव बना वजह?
जानकारों का मानना है कि बीएलओ के बाद अब निर्वाचन कार्यालयों में तैनात अधिकारियों पर भी काम का बोझ लगातार बढ़ा है। समय सीमा, लक्ष्य और जिम्मेदारियों का दबाव इतना ज्यादा हो गया है कि लोग नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं। खुद आलोक शर्मा ने बताया है कि उनकी सेवा में अभी दो साल बाकी हैं, लेकिन पारिवारिक हालात और लगातार बढ़ते काम के दबाव ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।
प्रशासन के लिए बढ़ती चिंता
इन घटनाओं ने चुनावी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर अनुभवी अधिकारी और कर्मचारी ही इस तरह नौकरी छोड़ने को मजबूर होंगे, तो सिस्टम कैसे चलेगा। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि मुख्य निर्वाचन कार्यालय इन आवेदनों पर क्या फैसला लेता है और क्या काम के दबाव को कम करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं। यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है।