Smartphone purchases: आज के दौर में स्मार्टफोन खरीदना जितना आसान हुआ है, उतना ही उलझन भरा भी। फेस्टिव सेल हो या नया लॉन्च, हर जगह “नो-कॉस्ट EMI” और “कम मासिक किस्त” जैसे ऑफर दिखते हैं। यही ऑफर लोगों को बार-बार नया फोन लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि ज्यादातर स्मार्टफोन 3–4 साल तक आराम से चल सकते हैं। इसके बावजूद हर 1–2 साल में फोन बदलने का चलन तेजी से बढ़ा है।
नो-कॉस्ट EMI, नाम का झांसा
नो-कॉस्ट EMI सुनने में भले ही फायदेमंद लगे, लेकिन अक्सर इसमें छिपी लागत होती है। अपफ्रंट भुगतान करने पर मिलने वाली सीधी छूट EMI चुनते ही खत्म हो जाती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, टैक्स और लेट पेमेंट चार्ज जैसे खर्च कुल कीमत को बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि ग्राहक बिना ब्याज के नाम पर भी 3 से 8 प्रतिशत ज्यादा भुगतान कर देता है।
एक्सचेंज ऑफर, आधा सच
पुराना फोन बदलो और हजारों का फायदा पाओ—यह ऑफर भी EMI के साथ जुड़ा रहता है। कई बार पुराने फोन की असली बाजार कीमत कम होती है और बाकी रकम बोनस के रूप में EMI प्लान में जोड़ दी जाती है। इससे ग्राहक को लगता है कि उसे बड़ा फायदा मिल रहा है, जबकि असल में वह लंबी किश्तों में ज्यादा पैसा चुका रहा होता है।
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फोन बन गया सब्सक्रिप्शन
मार्केट ट्रेंड बताते हैं कि भारत में लगभग आधी स्मार्टफोन खरीद EMI या क्रेडिट पर हो रही है। पहले लोग फोन 2–3 साल इस्तेमाल करते थे, अब 6–12 महीने में अपग्रेड आम बात हो गई है। आसान क्रेडिट ने फोन को एक तरह के सब्सक्रिप्शन मॉडल में बदल दिया है—पुराना फोन दो, नई EMI शुरू।
समझदारी जरूरी
EMI अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन बिना कुल खर्च समझे फैसला नुकसानदेह हो सकता है। किश्त चूकने पर क्रेडिट स्कोर बिगड़ता है और भविष्य के लोन महंगे हो सकते हैं। असली सवाल यही है—क्या आप फोन खरीद रहे हैं या हर साल नई EMI? जवाब आपकी आदत और समझ पर निर्भर करता है।