Supreme Court advises women: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1) से प्रभावित सभी महिलाओं, खासकर उन विधवा महिलाओं जिनके संतान नहीं हैं, से वसीयत बनाने की अपील की है। कोर्ट ने कहा कि कई बार महिलाओं की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति को लेकर मायके और ससुराल पक्ष में गंभीर विवाद पैदा हो जाते हैं, इसलिए महिलाओं को अपनी स्व-अर्जित और अन्य संपत्तियों के लिए स्पष्ट वसीयत बनानी चाहिए। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह सुझाव एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें धारा 15(1)(बी) को असंवैधानिक बताकर चुनौती दी गई थी।
धारा 15(1) पर विवाद और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि बिना वसीयत के मरने वाली निसंतान हिंदू महिला की संपत्ति को पति के उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता देना अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस प्रावधान की वैधता पर फैसला देने से इंकार किया, लेकिन यह माना कि आधुनिक समय में महिलाएं स्व-अर्जित संपत्ति रखती हैं, इसलिए इस तरह के नियमों से विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। केंद्र सरकार की ओर से पेश ASG ने कहा कि कानून महिलाओं को वसीयत बनाने की स्वतंत्रता देता है और धारा 15 सिर्फ वसीयत न होने की स्थिति में उत्तराधिकार तय करती है।
मध्यस्थता अनिवार्य, वसीयत से समाधान
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी महिला की मृत्यु वसीयत के बिना होती है और उसके माता-पिता या उनके उत्तराधिकारी संपत्ति पर दावा करते हैं, तो अदालत में जाने से पहले मुकदमे-पूर्व मध्यस्थता अनिवार्य होगी। मध्यस्थता में हुए समझौते को कोर्ट आदेश की मान्यता दी जाएगी। बेंच ने स्पष्ट कहा कि वसीयत बनाना महिलाओं के हितों की रक्षा करेगा और भविष्य के मुकदमेबाजी से बचाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी विवाद का समाधान मध्यस्थता या अदालतों में न हो पाए, तो प्रभावित पक्ष संबंधित प्रावधान को चुनौती दे सकते हैं।