पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर Supreme Court of India ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख एक हफ्ते बढ़ा दी है। कोर्ट ने कहा कि नई व्यवस्थाओं और उठाई गई चिंताओं को देखते हुए जांच प्रक्रिया को पूरा समय मिलना चाहिए, ताकि किसी भी योग्य मतदाता के साथ अन्याय न हो।
अधिकारियों की तैनाती और नई व्यवस्था
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार द्वारा दिए गए 8,555 ग्रुप-B अधिकारियों को तुरंत जिला निर्वाचन अधिकारियों को रिपोर्ट करना होगा। Election Commission of India को यह अधिकार दिया गया कि वह जरूरत पड़ने पर ERO और AERO को बदले और योग्य अधिकारियों से काम ले। इन अधिकारियों को माइक्रो ऑब्जर्वर के रूप में सीमित भूमिका दी जाएगी और अंतिम फैसला ERO ही करेगा।
सुनवाई में तीखी नोक-झोंक
सुनवाई के दौरान कई याचिकाओं पर एक साथ बहस हुई, जिससे कोर्ट नाराज दिखा। सीजेआई ने साफ कहा कि कोर्ट में अनुशासन जरूरी है। अदालत ने पूछा कि क्या पर्याप्त ग्रुप-A स्तर के अधिकारी तैनात किए गए हैं। राज्य सरकार ने बताया कि 292 ईआरओ और हजारों सहायक अधिकारी सूची में शामिल हैं, जबकि आयोग ने अनुभव और प्रशिक्षण की कमी पर सवाल उठाए।
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आयोग बनाम राज्य सरकार की दलीलें
चुनाव आयोग ने कहा कि SIR जैसे अर्ध-न्यायिक काम के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों की जरूरत होती है। आयोग का आरोप रहा कि राज्य ने समान वेतनमान के आधार पर अलग-अलग विभागों के अधिकारी भेजे, जिनके पास जरूरी अनुभव नहीं है। वहीं राज्य सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि इतने बड़े पैमाने पर SDM स्तर के अधिकारी उपलब्ध कराना व्यावहारिक नहीं है।
अंतिम सूची टलने की वजह
कोर्ट ने माना कि नए अधिकारियों के जुड़ने से दस्तावेजों की जांच में समय लगेगा। इसलिए ERO को 14 फरवरी के बाद एक सप्ताह अतिरिक्त समय दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि जल्दबाजी में सूची जारी हुई तो लाखों लोग मतदाता सूची से बाहर रह सकते हैं, जिसे कोर्ट ने गंभीरता से लिया।
केंद्र और राजनीति का संदेश
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि संविधान सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान जरूरी है। इस मामले में Mamata Banerjee समेत कई याचिकाएं सुनी गईं। कोर्ट के आदेश के बाद साफ है कि अब बंगाल में SIR प्रक्रिया ज्यादा निगरानी और संतुलन के साथ आगे बढ़ेगी।