Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों और सार्वजनिक संस्थानों में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आम लोगों को आखिर कब तक इस परेशानी का सामना करना पड़ेगा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं और कई मामलों में लोगों की जान तक जा रही है। कोर्ट ने इलाज से ज्यादा रोकथाम पर जोर देने की बात कही है।
आदेश की सीमा स्पष्ट
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने साफ किया कि उसका आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि स्कूलों, कोर्ट परिसरों और अन्य संस्थागत क्षेत्रों के लिए है। अदालत ने सवाल किया कि इन जगहों पर कुत्तों की मौजूदगी की जरूरत क्या है और उन्हें वहां से हटाने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
हादसों का खतरा, सड़कें हों खाली
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़कों को कुत्तों से साफ और सुरक्षित होना चाहिए। भले ही हर कुत्ता काटता न हो, लेकिन वे दुर्घटनाओं का कारण बन सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह पहचान करना मुश्किल है कि कौन सा कुत्ता कब आक्रामक हो सकता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है।
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बहस के दौरान तीखी टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान आवारा कुत्तों के पक्ष में दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने नसबंदी का सुझाव दिया। इस पर कोर्ट ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तो कुत्तों को काउंसलिंग देना ही बाकी रह गया है। जब सिब्बल ने अपने अनुभव साझा किए, तो कोर्ट ने जवाब दिया कि हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं होता।
सरकार से सवाल
अदालत ने सरकार से पूछा कि 2018 में एनिमल बर्थ कंट्रोल से जुड़े निर्देशों को ठीक से लागू क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि नियमों के पालन में देरी का खामियाजा जनता को नहीं भुगतना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 8 जनवरी को सुबह 10:30 बजे होगी।