महिला IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े 1993 के गृह मंत्रालय के नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर कोई महिला अधिकारी डॉक्टरों के अनुसार पूरी तरह फिट है, तो सिर्फ गर्भवती होने या मां बनने के आधार पर उसे प्रशिक्षण से रोकना उचित कैसे हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी महिलाओं पर एक जैसा नियम लागू नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर ने इस नियम को चुनौती दी है। फेज-2 प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती होने के बाद उन्हें प्रशिक्षण छोड़ने और बच्चे के जन्म के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने को कहा गया। बाद में उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन 1993 के नियम का हवाला देकर उनकी मांग अस्वीकार कर दी गई।
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केंद्र और अधिकारी की दलील
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई, तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठ सकती है। वहीं महिला अधिकारी की ओर से कहा गया कि पहले भी कुछ मामलों में ऐसी छूट दी जा चुकी है। उनका तर्क है कि फेज-2 प्रशिक्षण मुख्य रूप से कक्षा आधारित होता है और हर मामले का फैसला व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होना चाहिए।
अब अगली सुनवाई पर नजर
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि महिलाओं के हित में बनाए गए नियम उनके अधिकारों में बाधा नहीं बनने चाहिए। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या उर्वशी सेंगर को मौजूदा प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। फिलहाल केंद्र से जवाब मांगा गया है और मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।