
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश में पोर्नोग्राफी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर तत्काल कोई आदेश देने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह एक जटिल और सामाजिक प्रभाव वाला मामला है, जिस पर जल्दबाजी में फैसला नहीं लिया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस तरह के प्रतिबंधों के सामाजिक परिणामों पर विचार जरूरी है। सीजेआई गवई ने कहा, “नेपाल में जब पोर्न पर बैन लगाया गया, तब क्या हुआ था, यह सबने देखा।” दरअसल, नेपाल में हाल ही में पोर्नोग्राफी पर रोक लगने के बाद युवा वर्ग के विरोध और हिंसक प्रदर्शनों ने सरकार को परेशानी में डाल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है।
याचिकाकर्ता ने की राष्ट्रीय नीति की मांग
याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार से एक राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना तैयार करने की मांग की, ताकि देश में पोर्नोग्राफी पर नियंत्रण लगाया जा सके। उनका कहना था कि इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों पर यह सामग्री बच्चों और किशोरों के लिए आसानी से उपलब्ध है, जो मानसिक और सामाजिक रूप से नुकसानदेह है। कोविड काल में जब बच्चों ने ऑनलाइन क्लासेज के लिए मोबाइल और लैपटॉप का उपयोग शुरू किया, तब उनमें अश्लील सामग्री तक पहुंच भी आसान हो गई। याचिकाकर्ता का दावा था कि भारत में करीब 20 करोड़ से अधिक अश्लील वीडियो और क्लिप्स मौजूद हैं, जिनमें कई बाल यौन शोषण से संबंधित भी हैं।
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सरकार तय करे दिशा
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नाबालिगों की गतिविधियों को नियंत्रित करना अदालत का नहीं, बल्कि सरकार का नीतिगत विषय है। अदालत ने यह भी कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत सरकार के पास वेबसाइट ब्लॉक करने का अधिकार पहले से है, लेकिन इसका प्रभावी उपयोग जरूरी है। न्यायालय ने याचिका पर कोई निर्देश जारी नहीं किया और सुनवाई को आगे के लिए स्थगित कर दिया, यह कहते हुए कि किसी भी तरह के प्रतिबंध से पहले उसके सामाजिक और व्यावहारिक असर पर गंभीर विचार जरूरी है।