Violates fundamental rights: देश में लागू धर्मांतरण रोधी कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। इन कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार और 12 राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अलग-अलग राज्यों में लागू ये कानून संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
चार हफ्ते में जवाब देने के निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र और राज्यों से चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस याचिका को धर्मांतरण रोधी कानूनों से जुड़ी पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा जाएगा, ताकि पूरे विवाद पर एक साथ सुनवाई हो सके।
याचिका में क्या हैं आरोप
यह जनहित याचिका नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया (NCCI) की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है और इससे धार्मिक स्वतंत्रता, निजी जीवन और अंतरात्मा की आज़ादी जैसे बुनियादी अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। याचिका में इन कानूनों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की भी मांग की गई है।
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राज्य कानूनों पर भी सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ओडिशा, राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने अपने अलग धर्मांतरण रोधी कानून बनाए हैं या पुराने कानूनों में बदलाव किए हैं, जिन्हें अब तक अदालत में ठीक से परखा नहीं गया। इसलिए जरूरी है कि सभी कानूनों की संवैधानिक वैधता की एकसाथ जांच हो।
केंद्र का पक्ष और आगे की राह
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि इस विषय से जुड़ी कई याचिकाएं पहले से लंबित हैं और सरकार अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद यह तय माना जा रहा है कि धर्मांतरण रोधी कानूनों पर देश की सबसे बड़ी अदालत में व्यापक और निर्णायक बहस होने वाली है।