Action on Sharia Law: मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) आवेदन कानून 1937 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार से चार हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के साथ भेदभाव करता है, खासकर विरासत, संपत्ति और विवाह से जुड़े मामलों में।
अधिकारों पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि इस कानून के कारण मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम अधिकार मिलते हैं। विरासत और संपत्ति के मामलों में उन्हें आधा या उससे भी कम हिस्सा दिया जाता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन माना जा रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह का भेदभाव किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
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UCC और पर्सनल लॉ पर बहस तेज
इस मामले ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता (UCC) और पर्सनल लॉ के बीच बहस को तेज कर दिया है। याचिका में कहा गया है कि इतने वर्षों बाद भी ऐसा कानून लागू है, जो महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं देता।
आगे क्या होगा
अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट अगली सुनवाई करेगा। अगर अदालत इस कानून के प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करती है, तो यह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा फैसला साबित हो सकता है।