Medical College Fees: सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के निजी मेडिकल कॉलेज फीस को लेकर दाखिल याचिका को खारीज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वे EWS श्रेणी के छात्रों से सरकारी कॉलेजों के बराबर फीस लें।
स्कॉलरशिप की ले मदद
जस्टिस बी वी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि निजी कॉलेजों में अगर कोई छात्र फीस वहन नहीं कर पाता है, तो उनके लिए स्कॉलरशिप समेत अन्य विकल्प जैसे सबवेंशन या अन्य वित्तीय सहायता के विकल्प उपलब्ध हैं। कोर्ट ने समझाया कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों को सरकार की तरफ से वित्तीय मदद मिलती है, इसलिए वे कम फीस पर पढ़ा सकते हैं। इसके उलट, प्राइवेट कॉलेज पूरी तरह से छात्रों से मिलने वाली फीस के भरोसे ही चलते हैं।
चिकित्सा शिक्षा पर असर
अगर प्राइवेट कॉलेजों को पर्याप्त फीस लेने से रोका गया, तो मेडिकल की पढ़ाई के क्षेत्र में उनका योगदान खराब होगा। उन्होंने आगे कहा कि भारत को डॉक्टरों की सख्त जरूरत है और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि जो छात्र प्राइवेट कॉलेजों की भारी-भरकम फीस नहीं दे सकते, उनके लिए स्कॉलरशिप , सबवेंशन या सरकार की तरफ से अन्य आर्थिक मदद के विकल्प मौजूद हैं।
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राजस्थान के पुराने फैसले के खिलाफ दायर की गई थी याचिका
दरअसल, यह याचिका राजस्थान हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि एक तरफ तो सरकार ने EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के लिए सालाना पारिवारिक आय की सीमा ₹8 लाख तय की है और दूसरी तरफ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस इतनी ज्यादा है कि ₹8 लाख कमाने वाला परिवार उसे कभी नहीं भर सकता।
प्राइवेट कॉलेजों की फीस को माना था सही
हालांकि, राजस्थान हाई कोर्ट ने पहले ही प्राइवेट कॉलेजों की फीस के तरीके को सही माना था और कहा था कि राज्य की फीस नियामक समिति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देंशों के अनुसार ही फीस तय की गई है। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस अपील को खारिज करते हुए साफ किया है कि सिर्फ फीस ज्यादा होने की वजह से प्राइवेट कॉलेजों को सरकारी फीस पर पढ़ाने का आदेश नहीं दिया जा सकता।