Supreme Court NEET SS News: सुप्रीम कोर्ट ने देश के सरकारी डॉक्टरों के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सुपर-स्पेशियलिटी मेडिकल कोर्सेस में एडमिशन के लिए सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों के लिए कट-ऑफ मार्क्स कम होने चाहिए। क्योंकि वे हायर एजुकेशन के साथ-साथ मेडिकल फील्ड में भी सेवा दे रहे हैं। बता दें कि जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि ये डॉक्टर अस्पतालों में मरीजों का इलाज करने के साथ-साथ पढ़ाई भी करते हैं, इसलिए इन्हें सुपर-स्पेशियलिटी कोर्स आसानी से मिलने चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु की 152 खाली पड़ी सुपर-स्पेशियलिटी मेडिकल सीटों से जुड़ा है, जो सरकारी डॉक्टरों ('इन-सर्विस') के लिए आरक्षित थीं। इन सीटों को 'ऑल इंडिया कोटा' (AIQ) में शामिल करने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। वहीं, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने अधिकारियों को अपना जवाब फाइल करने का निर्देश दिया।
सरकारी डॉक्टरों को भारी नुकसान होगा
याचिकाकर्ताओं के वकील पी. विल्सन ने कोर्ट को बताया कि पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) सीटों के लिए तो पासिंग परसेंटाइल कम कर दिया गया है, लेकिन सुपर-स्पेशियलिटी सीटों के लिए काउंसलिंग का दूसरा राउंड ही नहीं हुआ। उन्होंने तर्क दिया कि काउंसलिंग का दूसरा राउंड पूरा होने और क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम करने पर अंतिम फैसला लिए बिना 152 सुपर-स्पेशियलिटी सीटों को ऑल इंडिया कोटा के माध्यम से भरने की अनुमति देने से सरकारी डॉक्टरों को भारी नुकसान होगा।
कोर्ट ने सरकारी डॉक्टरों के पक्ष में क्या कहा
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऑल इंडिया कोटा, यानी इन-सर्विस उम्मीदवार नहीं परसेंटाइल कम करना होगा क्योंकि वे दिन-रात काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी डॉक्टरों के लिए कम कट-ऑफ निर्धारित की जानी चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सरकारी डॉक्टर पब्लिक हेल्थ के लिए दिन-रात काम करते हैं। वे ड्यूटी के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ कुछ छात्र ऐसे हैं जो सिर्फ घर बैठकर तैयारी करते हैं। इसलिए सरकारी डॉक्टरों के लिए कट-ऑफ कम रखी जानी चाहिए।
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काम के साथ कर रहे पढ़ाई
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर सरकारी डॉक्टर सुपर-स्पेशियलिटी ट्रेनिंग लेकर अपनी स्किल्स सुधारेंगे, तो वे प्राइवेट डॉक्टरों के मुकाबले सरकारी अस्पतालों में आम जनता को बेहतर इलाज दे पाएंगे। मेरे हिसाब से, उनके लिए कट-ऑफ कम होना चाहिए क्योंकि वे काम और पढ़ाई दोनों कर रहे हैं। बेंच का मानना है कि हर राज्य में इन-सर्विस डॉक्टरों की अपनी कैटेगरी होती है। अगर इन सीटों को ऑल इंडिया कोटा में बदल दिया जाएगा, तो राज्य के डॉक्टरों और वहां की जनता को कोई फायदा नहीं होगा।
15 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
नेशनल मेडिकल कमीशन की तरफ से पेश वकील मिठू जैन ने दलील दी कि ऑल इंडिया कोटा में सीटों का सरेंडर N. कार्तिकेयन मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक किया गया था, जो अभी भी पेंडिंग है। इस पर कोर्ट ने साफ किया कि वे पुराने आदेश में कोई दखल नहीं दे रहे हैं। लेकिन NMC को अपने पिछले उदाहरणों को देखना चाहिए जहां उन्होंने परसेंटाइल कम किया था। उनके लिए काउंसलिंग कराएं। बाकी सीटें कन्वर्ट कर दी जाएंगी। इस पूरे मामले पर अब अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी।