Supreme Court strict comment on Pakistani Hindu: पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के चलते भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदू शरणार्थियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ कहा है कि केवल भारतीय नागरिकता देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन लोगों को रहने के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक आवास देना भी सरकार की जिम्मेदारी है। दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रह रहे सैकड़ों शरणार्थी परिवारों के मामले में कोर्ट ने यह टिप्पणी की है।
मजनू का टीला में रह रहे सैकड़ों परिवार
सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि मजनू का टीला क्षेत्र में करीब 250 परिवार और लगभग एक हजार लोग पिछले 10–12 वर्षों से रह रहे हैं। ये सभी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी हैं, जिन्होंने वहां धार्मिक आधार पर उत्पीड़न झेलने के बाद भारत में शरण ली थी। इनमें से कई परिवारों को नागरिकता संशोधन कानून के तहत भारतीय नागरिकता भी मिल चुकी है।
डीडीए के बेदखली आदेश पर लगी रोक
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने इन शरणार्थियों को मजनू का टीला खाली करने का नोटिस जारी किया था। इस आदेश के खिलाफ पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई, लेकिन किसी ठोस नीति के अभाव में राहत नहीं मिल सकी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने डीडीए के बेदखली आदेश पर रोक लगा दी।
कोर्ट ने सरकार से क्या पूछा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जब इन लोगों को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है, तो उन्हें रहने का अधिकार क्यों नहीं दिया जा सकता। अदालत ने इसे मानवीय और संवैधानिक मुद्दा बताते हुए कहा कि नागरिकता के साथ-साथ बुनियादी जीवन सुविधाएं भी जरूरी हैं।
चार हफ्ते में फैसला लेने के निर्देश
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर विचार करे और चार हफ्तों के भीतर अपना रुख स्पष्ट करे। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए कि नागरिकता मिलने के बाद इन शरणार्थियों को बेघर रखना न्यायसंगत नहीं होगा।