Temples of social justice:हाल ही में तमिलनाडु में मंदिरों के धन को कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण में लगाने को लेकर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है. हालांकि यह मुद्दा केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक न्याय के मॉडल से जुड़ा हुआ है जो विशेष रूप से दक्षिण भारत में उभरा है. यह मॉडल मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि समाज के विकास में भागीदार मानता है. मद्रास प्रेसीडेंसी के समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार, मंदिरों के संसाधनों का उपयोग जनहित के लिए किया जा सकता है, और यही विचार अब भी प्रासंगिक बना हुआ है.
इतिहास में झांकें तो धर्मनिरपेक्षता की नींव से जुड़ा है मॉडल
1817 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘धार्मिक बंदोबस्ती और एस्कीट्स विनियमन’ के जरिए भारत में मंदिरों और धार्मिक संपत्तियों के प्रशासन को एक विधायी ढाँचे के तहत लाने की शुरुआत की थी. हालांकि 1857 की क्रांति के बाद जब ब्रिटिश शासन सीधे भारत पर लागू हुआ, तो महारानी विक्टोरिया ने ऐलान किया कि राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा. लेकिन तब तक मंदिर प्रशासन का ढांचा एक नीति आधारित रूप ले चुका था, जिसे आगे चलकर सामाजिक कल्याण से जोड़ा गया.
वर्तमान में राजनीतिक ध्रुवीकरण की आशंका
जैसे-जैसे तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस मुद्दे पर सियासी दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है. कुछ इसे धार्मिक भावना से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं, तो कुछ इसे पिछड़े वर्गों के उत्थान और शिक्षा के प्रसार से जोड़ रहे हैं. ऐसे में ज़रूरत है कि मंदिरों के संसाधनों का उपयोग पारदर्शिता और न्याय के साथ हो, जिससे समाज का हर वर्ग लाभान्वित हो सके, और धार्मिक राजनीति से हटकर विकास की दिशा में आगे बढ़ा जा सके.