Growing Responsibility of Supreme Court: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती लंबित मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या है। वर्ष 2025 के अंत तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92 हजार से अधिक पहुंच चुकी है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। बीते कुछ वर्षों में यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2014 में जहां यह संख्या लगभग 63 हजार थी, वहीं 2023 के अंत तक यह 80 हजार के करीब पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मामलों के दाखिल होने की यही रफ्तार रही, तो 2026 में यह संख्या एक लाख तक पहुंच सकती है। समस्या यह है कि नए मुकदमे दाखिल होने की गति, निपटारे की गति से अधिक बनी हुई है। हालांकि न्यायाधीशों की संख्या में आंशिक बढ़ोतरी हुई है, लेकिन उसका असर लंबित मामलों को कम करने में स्पष्ट रूप से नहीं दिख रहा।
निपटारे के प्रयास और वैश्विक तुलना
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75 हजार से अधिक मामलों का निपटारा कर यह दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय न्यायपालिका बेहद सक्रिय है। यदि अंतरराष्ट्रीय तुलना करें, तो भारत का सुप्रीम कोर्ट अमेरिका और ब्रिटेन की शीर्ष अदालतों से कहीं अधिक मामलों पर सुनवाई करता है। अमेरिका में हर साल हजारों याचिकाएं दाखिल होती हैं, लेकिन उनमें से केवल 70–80 मामलों में ही विस्तृत सुनवाई होती है। ब्रिटेन में भी शीर्ष अदालत साल भर में गिने-चुने मामलों का निपटारा करती है। इसके उलट, भारत में सैकड़ों संवैधानिक मामलों समेत हजारों याचिकाओं पर आदेश और फैसले दिए जाते हैं। यह सक्रियता सराहनीय है, लेकिन बढ़ते बोझ को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं मानी जा रही।
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मध्यस्थता और न्यायिक ढांचे की चुनौती
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने लंबित मामलों को कम करने के लिए मध्यस्थता को प्रभावी विकल्प के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि आपसी सहमति से विवाद सुलझाना न्याय प्रणाली की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी परिपक्वता को दर्शाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी इस विचार का समर्थन कर चुके हैं। इसके साथ ही, जजों की कमी भी एक गंभीर समस्या है। भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग ने वर्षों पहले 50 जजों की सिफारिश की थी। जब तक मध्यस्थता, तकनीक और न्यायिक संसाधनों का संतुलित विस्तार नहीं होगा, तब तक सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित मुकदमों की चुनौती बनी रहेगी।