15 अगस्त 1947 भारत के इतिहास का सबसे अहम दिन माना जाता है। इसी दिन देश ने लंबे संघर्ष के बाद ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल की। लेकिन आजादी का यह उत्सव विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक हिंसा के बीच आया था। उस दौर में सत्ता हस्तांतरण से लेकर देश के बंटवारे तक कई बड़े फैसले बेहद कम समय में लिए गए। 15 अगस्त से जुड़े कुछ ऐसे प्रसंग भी हैं, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं लेकिन आम चर्चा में कम आते हैं।
दिल्ली में गांधी जी ने सुभद्रा जोशी से की मुलाकात
आजादी से पहले दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव का माहौल था। जब महात्मा गांधी दिल्ली लौटे तो उन्हें पता चला कि उनकी शिष्या सुभद्रा जोशी किंग्सवे अस्पताल में भर्ती हैं। गांधी जी उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे। मुलाकात के दौरान उन्होंने सुभद्रा जोशी से दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए निर्दोष लोगों की संख्या के बारे में पूछा। यह प्रसंग उस समय दिल्ली में बने तनावपूर्ण माहौल और गांधी जी की चिंता को दर्शाता है।
72 दिनों में सत्ता हस्तांतरण की बड़ी तैयारी
20 फरवरी 1947 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की थी कि ब्रिटिश शासन भारत से समाप्त होगा। इसके बाद 3 जून को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की योजना सामने रखी। इसके लिए बेहद कम समय निर्धारित किया गया था। इस प्रक्रिया में भारत के विभाजन के साथ सेना, सिविल सेवा, रेलवे, पुलिस और डाक व्यवस्था के बंटवारे जैसे जटिल काम शामिल थे। सरकारी संपत्तियों और कार्यालयों में मौजूद सामान के बंटवारे तक की व्यवस्था करनी थी। माउंटबेटन के कार्यालय में एक ऐसा कैलेंडर भी रखा गया था, जिससे सत्ता हस्तांतरण के लिए बचे दिनों का हिसाब रखा जाता था।
नेहरू का ऐतिहासिक भाषण और खाली लिफाफे का किस्सा
14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपना प्रसिद्ध ‘नियति से साक्षात्कार’ भाषण दिया। इसके बाद वे माउंटबेटन को स्वतंत्र भारत का गवर्नर-जनरल बनने का औपचारिक निमंत्रण देने पहुंचे। कहा जाता है कि उन्हें एक लिफाफा सौंपा गया था, जिसमें मंत्रिपरिषद के सदस्यों के नाम होने थे। लेकिन जल्दबाजी में लिफाफे को बिना सूची के ही सील कर दिए जाने का किस्सा भी सामने आता है। बाद में इस चूक को लेकर हल्के-फुल्के अंदाज में चर्चा हुई।
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माउंटबेटन के लिए 15 अगस्त था खास दिन
15 अगस्त 1947 की तारीख को लेकर कुछ ज्योतिषियों ने इसे शुभ नहीं माना था। लेकिन माउंटबेटन के लिए यह तारीख व्यक्तिगत रूप से बेहद महत्वपूर्ण थी। 15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण किया था। उस समय माउंटबेटन मित्र देशों की ओर से दक्षिण-पूर्व एशिया के सुप्रीम कमांडर थे। इसलिए 15 अगस्त उनके लिए द्वितीय विश्व युद्ध की एक बड़ी ऐतिहासिक घटना से भी जुड़ा हुआ था।
पाकिस्तान 14 अगस्त को क्यों बना?
भारत के साथ पाकिस्तान की स्वतंत्रता की तारीख को लेकर भी एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 में 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान नाम के दो स्वतंत्र डोमिनियन बनाए जाने की बात कही गई थी। इसके बावजूद पाकिस्तान में 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि माउंटबेटन को कराची में सत्ता हस्तांतरण समारोह में शामिल होने के बाद नई दिल्ली पहुंचना था। इसी कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस की तारीख 14 अगस्त निर्धारित हुई।
आजादी का जश्न, लेकिन विभाजन का गहरा दर्द
15 अगस्त 1947 भारत के लिए स्वतंत्रता का ऐतिहासिक दिन था, लेकिन उसी समय देश विभाजन की भारी त्रासदी से भी गुजर रहा था। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और सांप्रदायिक हिंसा ने बड़ी संख्या में परिवारों को प्रभावित किया। इसलिए स्वतंत्रता की कहानी केवल उत्सव की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक बदलाव, प्रशासनिक बंटवारा, विस्थापन और सामाजिक पीड़ा के कई अध्याय भी जुड़े हुए हैं।