Sabarimala case: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। नौ जजों की संविधान पीठ इस अहम मुद्दे पर विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। यह मामला धार्मिक आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के चौथे दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर किसी धर्म की मूल संरचना को कमजोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह संकेत दिया कि धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा।
TDB की दलीलें
त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं बल्कि एक पूरे समुदाय की परंपरा और पहचान है। इसलिए अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा सही है या गलत।
अनुच्छेद 25 का हवाला
सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25 का जिक्र करते हुए कहा कि यह हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक व्यक्ति की पसंद पूरे समुदाय की परंपराओं और अन्य लोगों के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकती।
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धार्मिक प्रथाओं पर बहस
सुनवाई के दौरान ‘Essential Religious Practice’ यानी आवश्यक धार्मिक प्रथा के सिद्धांत पर भी सवाल उठाए गए। TDB का कहना है कि यह सिद्धांत संविधान की मूल भावना से परे है और इस पर विस्तार से बहस की जरूरत है।
सुनवाई जारी रहेगी
इस मामले में पिछले चार दिनों से लगातार सुनवाई हो रही है और आगे भी जारी रहेगी। नौ जजों की पीठ में कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं, जो इस संवेदनशील मुद्दे पर अंतिम निर्णय की दिशा तय करेंगे।