पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। करीब 28 साल पुरानी पार्टी अब तीन अलग-अलग गुटों में बंटी नजर आ रही है। एक ओर ममता बनर्जी का वफादार खेमा है, दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट और तीसरी ओर हुमायूं कबीर का अलग राजनीतिक मोर्चा है। ऐसे में राज्य की राजनीति का पूरा समीकरण बदलता दिखाई दे रहा है।
चुनाव के बाद बढ़ी टूट, तीन गुटों में बंटी टीएमसी
टीएमसी में टूट की शुरुआत चुनाव से पहले ही हो गई थी। हुमायूं कबीर ने पार्टी से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाई और चुनाव में दो सीटें जीतने में सफलता हासिल की। वहीं चुनाव नतीजों के बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हो गए। इसके अलावा लोकसभा सांसदों का भी एक समूह अलग राह पर चल पड़ा। इन सबके बीच ममता बनर्जी अपने वफादार नेताओं के साथ संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन पार्टी के सामने राजनीतिक चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है।
ममता गुट पर जांच और सियासी दबाव
नई सरकार अब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट पर भी लगातार सख्ती करती दिखाई दे रही है। सरकार 2011 से 2026 के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार, भर्ती और राशन घोटालों की जांच तेज कर रही है। कई चर्चित नेताओं पर कानूनी कार्रवाई भी जारी है। इसी बीच 21 जुलाई के शहीद दिवस कार्यक्रम को लेकर भी प्रशासन ने अनुमति नहीं दी, जिससे ममता गुट के शक्ति प्रदर्शन की तैयारी को झटका लगा। राजनीतिक जानकार इसे विपक्ष की सक्रियता सीमित करने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं।
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ऋतब्रत गुट भी सरकार के निशाने पर
शुरुआत में ऋतब्रत बनर्जी की बगावत को सत्ता पक्ष के लिए राजनीतिक लाभ माना गया, लेकिन अब उनका गुट भी सरकार के निशाने पर है। समान नागरिक संहिता (UCC) से जुड़े प्रस्ताव पर विधानसभा में विरोध और वॉकआउट के बाद दोनों पक्षों के बीच दूरी और बढ़ गई। बताया जा रहा है कि ऋतब्रत गुट भी शहीद दिवस पर अलग शक्ति प्रदर्शन करना चाहता था, लेकिन प्रशासन की ओर से अनुमति नहीं मिलने के कारण उसकी योजना पूरी नहीं हो सकी। इससे राज्य की विपक्षी राजनीति में नई खींचतान देखने को मिल रही है।
हुमायूं कबीर पर बढ़ा कानूनी दबाव
टीएमसी से अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर भी सरकार की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। एक जनसभा में दिए गए उनके विवादित बयान के बाद उनके खिलाफ अलग-अलग थानों में मामले दर्ज किए गए हैं। सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा और भड़काऊ बयान देने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में बयानबाजी और कानूनी कार्रवाई दोनों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
आगे किस दिशा में जाएगी बंगाल की राजनीति?
बंगाल की राजनीति इस समय तेजी से बदलते दौर से गुजर रही है। एक ओर ममता बनर्जी अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं, दूसरी ओर अलग हुए गुट अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। वहीं सरकार कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए सख्त संदेश देने में जुटी है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि टीएमसी के ये तीनों गुट अपनी राजनीतिक ताकत बचा पाते हैं या बंगाल की राजनीति में कोई नया समीकरण उभरकर सामने आता है।