करीब दस साल पहले शुरू हुई उज्ज्वला योजना ने देश की करोड़ों महिलाओं की जिंदगी बदल दी। गांवों और गरीब परिवारों तक गैस सिलेंडर पहुंचा और चूल्हे के धुएं से राहत मिली। धीरे-धीरे गैस का इस्तेमाल बढ़ता गया और आज एलपीजी देश के ज्यादातर घरों की जरूरत बन चुका है। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय हालात ने एक नई चिंता पैदा कर दी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण एलपीजी सप्लाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं और लोग यह सोचने लगे हैं कि अगर संकट बढ़ा तो क्या असर पड़ेगा।
तेजी से बढ़ी एलपीजी की खपत
उज्ज्वला योजना के बाद देश में गैस की खपत तेजी से बढ़ी है। लाखों नए कनेक्शन जुड़ने से एलपीजी की मांग लगातार ऊपर गई। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े गैस उपभोक्ताओं में शामिल हो चुका है। समस्या यह है कि देश में गैस का उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाया जितनी तेजी से इसकी मांग बढ़ी। इसी वजह से बड़ी मात्रा में गैस विदेशों से मंगानी पड़ती है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है। अनुमान है कि देश की कुल एलपीजी जरूरत का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आता है। इनमें पश्चिम एशिया के देश जैसे कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख हैं। यही कारण है कि जब उस क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो भारत की गैस सप्लाई को लेकर चिंता भी बढ़ जाती है।
ये भी पढ़ें : न वंदे भारत न राजधानी, कम किराए वाली इस ट्रेन को मिल रही जबरदस्त लोकप्रियता
होर्मुज मार्ग पर निर्भर सप्लाई
भारत की अधिकतर गैस सप्लाई एक अहम समुद्री रास्ते से होकर आती है जिसे होर्मुज मार्ग कहा जाता है। इसी रास्ते से टैंकरों के जरिए गैस भारत तक पहुंचती है। अगर इस मार्ग में किसी कारण से बाधा आती है तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसलिए पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का संघर्ष भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
पभंडारण क्षमता भी एक बड़ी चुनौती
ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी भी देश के पास ईंधन का पर्याप्त भंडार होना जरूरी होता है। लेकिन एलपीजी के मामले में भारत की स्टोरेज क्षमता अभी सीमित मानी जाती है। अगर सप्लाई में कुछ दिनों की भी रुकावट आ जाए तो परेशानी बढ़ सकती है। यही वजह है कि अब सरकार उत्पादन बढ़ाने और स्टोरेज मजबूत करने पर भी जोर दे रही है।
विकल्पों पर भी हो रहा विचार
सरकार अब गैस के साथ-साथ दूसरे विकल्पों पर भी ध्यान दे रही है। सौर ऊर्जा से खाना पकाने की तकनीक और घरेलू सोलर सिस्टम को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। उद्देश्य यह है कि लोगों की एलपीजी पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर बदलाव करने में समय लगेगा। फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि देश की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए दीर्घकालीन योजना बनाई जाए।