UP Panchayat Election : उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में हुई देरी अब अदालत की निगरानी में आ गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने चुनाव समय पर नहीं कराए जाने को गंभीर मामला मानते हुए राज्य सरकार से पूरा रिकॉर्ड तलब किया है। अदालत यह जानना चाहती है कि पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव क्यों नहीं कराए जा सके और इसके पीछे सरकार की लापरवाही थी या कोई ऐसी परिस्थिति, जो उसके नियंत्रण से बाहर थी।
हाईकोर्ट ने सरकार से क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव की तैयारी आखिरी समय पर नहीं, बल्कि काफी पहले शुरू होनी चाहिए। अदालत की टिप्पणी थी कि भविष्य में चुनाव कराने की प्रक्रिया पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम दो साल पहले शुरू की जानी चाहिए। कोर्ट ने सरकार से चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सभी रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया है।
संविधान क्या कहता है?
बेंच ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और इसकी अवधि समाप्त होने से पहले नए चुनाव कराना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि इस संवैधानिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने के लिए चुनावी प्रक्रिया समय रहते शुरू होना जरूरी है, ताकि कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासनिक अनिश्चितता की स्थिति न बने।
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11 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने बताया कि उसने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कुछ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी देखे हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर ये रिकॉर्ड फिर प्रस्तुत किए जाएं। कोर्ट यह भी जांच करेगा कि यदि प्रक्रिया पहले शुरू की गई थी, तो फिर भी चुनाव तय समय पर क्यों नहीं हो सके। मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की गई है।
चुनाव टलने की वजह क्या रही?
राज्य सरकार की ओर से पहले पंचायत चुनाव मई-जून में कराए जाने की तैयारी थी, लेकिन अंतिम मतदाता सूची समय पर तैयार नहीं हो सकी। फाइनल वोटर लिस्ट 10 जून को जारी हुई। इसके अलावा, ओबीसी आयोग विभिन्न जिलों में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की समीक्षा कर आरक्षण संबंधी सिफारिशें तैयार कर रहा था। इसी प्रक्रिया के चलते चुनाव कार्यक्रम तय समय पर घोषित नहीं हो सका।