भारत खुद को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहता है। सरकार कई योजनाओं के जरिए फैक्ट्री और उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। मकसद है कि देश में ज्यादा से ज्यादा सामान बने और दुनिया के बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़े। लेकिन इस राह में अब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से चुनौतियां सामने आ रही हैं।
अमेरिका की सोलर ड्यूटी का असर
अमेरिका ने भारत से आने वाले सोलर प्रोडक्ट्स पर 126 प्रतिशत तक की शुरुआती ड्यूटी लगा दी है। उसका कहना है कि भारत सरकार की सब्सिडी घरेलू कंपनियों को अनुचित फायदा देती है। भारी टैक्स के कारण भारतीय सोलर कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में टिके रहना मुश्किल हो सकता है। इससे निर्यात पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
चीन की डब्ल्यूटीओ में शिकायत
दूसरी तरफ चीन ने विश्व व्यापार संगठन में भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उसका आरोप है कि ऑटोमोबाइल और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत की योजनाएं आयात के बजाय घरेलू सामान को तरजीह देती हैं। अब इस मामले में औपचारिक जांच की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिससे व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है।
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झगड़े के केंद्र में पीएलआई योजना
इन विवादों का मुख्य कारण भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी पीएलआई योजना है। इसे 2020 में शुरू किया गया था ताकि इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, सोलर और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादन बढ़ सके। इस योजना के लिए लगभग 1.91 ट्रिलियन रुपये का प्रावधान किया गया है। कई बड़ी कंपनियों ने इसी योजना के तहत अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई है।
भारत का पक्ष क्या है
सरकार का कहना है कि ये सभी योजनाएं अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत हैं। उनका तर्क है कि मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना देश की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है। लक्ष्य है कि जीडीपी में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 17 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत की जाए। अधिकारियों के मुताबिक यह लंबे समय की रणनीति का हिस्सा है।
आगे की राह कितनी आसान?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पीएलआई जैसी योजनाओं के बिना उत्पादन में तेजी लाना कठिन होगा। लेकिन बड़े देशों के बढ़ते दबाव को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। संभव है कि भविष्य में सरकार सीधे सब्सिडी के बजाय तकनीक और नवाचार पर ज्यादा जोर दे। फिलहाल साफ है कि भारत की औद्योगिक रणनीति अब वैश्विक व्यापार बहस के केंद्र में आ गई है।