अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा सैन्य तनाव अब चौथे दिन में पहुंच चुका है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले कर रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में हालात गंभीर बने हुए हैं। अमेरिकी नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि यह अभियान कई हफ्तों तक चल सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस कार्रवाई की कीमत अमेरिका को कितनी चुकानी पड़ रही है।
पहले 24 घंटे में भारी खर्च
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती एक दिन में ही अमेरिका ने सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। सैन्य तैयारियों, विमान तैनाती और ऑपरेशन चलाने में बड़ी रकम लगी। हमले शुरू होने से पहले भी हथियारों, जहाजों और विमानों की तैनाती पर भारी खर्च हुआ। यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि बजट पर भी भारी पड़ता है।
फाइटर जेट्स और ड्रोन पर खर्च
शुरुआती हमलों में कई उन्नत लड़ाकू विमान और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। एफ-18, एफ-16, एफ-22 और एफ-35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट्स मिशन में शामिल रहे। इनके संचालन, ईंधन और हथियारों पर बड़ी लागत आती है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर विमान और अनमैन्ड सिस्टम भी तैनात किए गए, जिससे खर्च और बढ़ गया।
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नौसेना की तैनाती भी महंगी
खाड़ी क्षेत्र में विमानवाहक पोत और स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती का खर्च भी कम नहीं है। एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को रोजाना ऑपरेट करने में लाखों डॉलर लगते हैं। अगर ऐसे कई ग्रुप कई हफ्तों तक तैनात रहते हैं, तो कुल खर्च अरबों डॉलर तक पहुंच सकता है। मिसाइल डिफेंस, निगरानी प्रणाली और खुफिया गतिविधियों का खर्च अलग है।
अफगानिस्तान का पुराना अनुभव
अमेरिका पहले भी लंबे सैन्य अभियानों का आर्थिक बोझ झेल चुका है। अफगानिस्तान में दो दशकों तक चले अभियान पर खरबों डॉलर खर्च हुए। केवल रक्षा बजट ही नहीं, बल्कि सैनिकों की देखभाल और पुनर्वास पर भी भारी रकम खर्च होती रही। विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे संघर्ष का असर आने वाले वर्षों तक पड़ता है।
आगे क्या होगा असर
अगर यह तनाव लंबा चलता है, तो अमेरिका का रक्षा बजट और दबाव में आ सकता है। युद्ध केवल सैन्य ताकत की परीक्षा नहीं होता, बल्कि आर्थिक क्षमता की भी कसौटी बन जाता है। फिलहाल साफ है कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई अमेरिका के लिए सस्ती नहीं है और हर दिन का खर्च तेजी से बढ़ रहा है।