अमेरिका से एक बार फिर ऐसा संकेत मिला है जिससे पूरी दुनिया की नजरें भारत और चीन पर टिक गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों के खिलाफ सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं जो रूस से तेल खरीद रहे हैं। इस कदम को रूस पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगर यह फैसला आगे बढ़ा तो कई देशों की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा नीति पर सीधा असर पड़ेगा।
रूस से तेल खरीदने वालों पर सख्ती का संकेत
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंध वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का मकसद उन देशों पर दबाव बनाना है जो रूस से सस्ता तेल खरीद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि इससे रूस को आर्थिक ताकत मिल रही है और उसका सैन्य अभियान चलता रहता है। इसी वजह से भारत चीन और ब्राजील जैसे देशों का नाम चर्चा में है।
क्या है रूस पर प्रतिबंध अधिनियम
अमेरिकी संसद में पेश किए गए प्रस्ताव का नाम रूस पर प्रतिबंध अधिनियम दो हजार पच्चीस बताया गया है। इसके तहत रूस से आने वाले सामान और सेवाओं पर भारी शुल्क लगाने का प्रावधान रखा गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि ऐसे आयात पर मूल्य से कई गुना ज्यादा शुल्क लगाया जा सकता है। इससे रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनेगा।
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भारत को लेकर ट्रंप का दावा
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुश नहीं हैं। ट्रंप का दावा है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे शुल्क को लेकर भारत में नाराजगी है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारत ने तेल खरीद को लेकर अमेरिकी चिंताओं का समाधान नहीं किया तो शुल्क और बढ़ाया जा सकता है। इस बयान के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
भारत का साफ जवाब
भारत सरकार ने ट्रंप के दावे को पूरी तरह खारिज किया है। सरकार का कहना है कि रूस से तेल खरीद को लेकर कोई वादा या बातचीत नहीं हुई। भारत ने दोहराया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हित पर आधारित है। वैश्विक बाजार में कीमतों की अस्थिरता के बीच सस्ता और स्थिर ईंधन खरीदना देश की जरूरत है।
आगे क्या हो सकता है असर
अगर अमेरिका यह प्रस्ताव पारित करता है तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव आ सकता है। भारत जैसे देशों को कूटनीतिक संतुलन साधना होगा। एक तरफ सस्ते तेल की जरूरत है तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दबाव। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि अमेरिका कितना आगे जाता है और भारत इस चुनौती से कैसे निपटता है।