अमेरिकी सीनेट में रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक पर मतदान की तैयारी चल रही है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल और गैस की खरीद जारी रखते हैं।
भारत और चीन क्यों हैं चिंता में?
भारत और चीन दुनिया में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चीन प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल और भारत करीब 17 लाख बैरल रूसी कच्चे तेल का आयात करता है। यदि यह कानून पारित होकर लागू होता है और टैरिफ लगाने का फैसला किया जाता है, तो दोनों देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
क्या है प्रस्तावित विधेयक?
रिपोर्ट के मुताबिक, इस कानून का नाम 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' रखा गया है। इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को सीमित करना और यूक्रेन युद्ध के लिए उपलब्ध आर्थिक संसाधनों पर दबाव बनाना है। साथ ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आर्थिक प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाने की योजना है।
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भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में सस्ते रूसी तेल ने देश की ईंधन आपूर्ति और रिफाइनिंग उद्योग को महत्वपूर्ण सहारा दिया है। यदि अमेरिकी कानून लागू होने के बाद टैरिफ लगाए जाते हैं, तो भारत के ऊर्जा आयात और व्यापारिक लागत पर असर पड़ सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर भी पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रस्ताव के तहत टैरिफ लागू किए जाते हैं, तो इसका प्रभाव केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं पर भी असर पड़ सकता है और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
अभी कानून नहीं बना, फैसला बाकी
फिलहाल यह केवल प्रस्तावित विधेयक है और इस पर अमेरिकी सीनेट में मतदान होना है। इसके बाद भी इसके लागू होने और राष्ट्रपति द्वारा टैरिफ लगाने जैसे फैसले आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेंगे। यानी भारत पर 100% टैरिफ लगना अभी तय नहीं है, लेकिन प्रस्तावित कानून ने भारत और चीन जैसे रूसी तेल आयातक देशों की चिंता जरूर बढ़ा दी है।