UP Rajya Sabha Election : उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा जहां 7 सीटें अपने दम पर जीतने की मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, वहीं समाजवादी पार्टी भी 2 सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर सकती है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उस संभावना की है, जिसमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतार सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो चुनावी गणित और राजनीतिक रणनीति दोनों ही दिलचस्प हो जाएंगी।
क्या है पूरा गणित
राज्यसभा की 10 सीटों के लिए मौजूदा विधानसभा संख्या 397 मानी जा रही है। इस हिसाब से एक उम्मीदवार को जीत के लिए 37 वोटों की जरूरत होगी। सपा के पास फिलहाल 101 विधायक हैं। यह संख्या दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त है, लेकिन तीसरे उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए पार्टी को अतिरिक्त समर्थन या वरीयता वोटों की जरूरत पड़ेगी।
सपा की रणनीति पर नजर
सूत्रों के मुताबिक सपा दो सीटों पर अपने वरिष्ठ नेताओं को उतार सकती है। इसके साथ ही तीसरे उम्मीदवार को उतारने का विकल्प भी खुला रखा गया है। यदि सपा तीसरा प्रत्याशी उतारती है तो उसकी नजर दूसरे दलों के वोटों और वरीयता मतदान पर रहेगी। ऐसे में चुनाव केवल संख्या का नहीं बल्कि राजनीतिक प्रबंधन का भी बन जाएगा।
भाजपा के पास क्या बढ़त
भाजपा के पास अपने विधायकों के अलावा सहयोगी दलों का भी समर्थन है। अपना दल (एस), आरएलडी, सुभासपा, निषाद पार्टी और अन्य समर्थक विधायकों को जोड़ने पर भाजपा गठबंधन का आंकड़ा करीब 294 तक पहुंचता दिखाई देता है। यह संख्या 8वीं सीट के बेहद करीब है, हालांकि पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही।
वरीयता वोट बन सकते हैं गेमचेंजर
इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वरीयता मतदान की हो सकती है। अगर कुछ विधायक अपने दूसरे वरीयता वोट किसी उम्मीदवार के पक्ष में डालते हैं तो पूरी तस्वीर बदल सकती है। यही वजह है कि दोनों बड़े दल अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने के साथ-साथ अतिरिक्त समर्थन जुटाने की कोशिश में लगेंगे।
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नतीजों का राजनीतिक संदेश
राज्यसभा चुनाव सिर्फ सांसद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसे शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा आठवीं सीट जीतने की कोशिश करेगी, जबकि सपा तीसरे उम्मीदवार के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने का प्रयास कर सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में उम्मीदवारों के नाम, समर्थन जुटाने की कवायद और वरीयता वोटों की रणनीति इस चुनाव को और दिलचस्प बना सकती है।