15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी को भारतीय क्रिकेट का भविष्य बताकर टीम में शामिल किया गया। उनके चयन के बाद उन्हें लेकर काफी चर्चा हुई और क्रिकेट जगत में उन्हें अगला बड़ा सितारा माना गया। लेकिन आयरलैंड के खिलाफ दो टी20 और इंग्लैंड के खिलाफ पहला मुकाबला बीत जाने के बावजूद उन्हें प्लेइंग इलेवन में मौका नहीं मिला। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब अभी खिलाने की योजना नहीं थी, तो इतनी जल्दी टीम में शामिल करने का फैसला क्यों लिया गया।
प्रचार ज्यादा, मौका कम
सीरीज के प्रसारण से पहले वैभव को प्रमुख चेहरों में शामिल किया गया और उन्हें लेकर काफी उत्साह दिखा। लेकिन मैच शुरू होने के बाद वह लगातार बेंच पर ही बैठे रहे। टीम मैनेजमेंट का तर्क हो सकता है कि इतनी कम उम्र में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, लेकिन दूसरी ओर यह भी सवाल उठ रहा है कि अगर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार नहीं था, तो चयन का फैसला किस आधार पर लिया गया।
प्रदर्शन का पैमाना सबके लिए समान हो
इंग्लैंड के खिलाफ पहले टी20 में भारतीय बल्लेबाजी पूरी तरह प्रभावी नहीं दिखी। संजू सैमसन समेत कुछ बल्लेबाज लगातार रन बनाने में संघर्ष कर रहे हैं। अनुभवी खिलाड़ियों को फॉर्म में लौटने के लिए लगातार मौके मिल रहे हैं, लेकिन युवा खिलाड़ियों को इंतजार करना पड़ रहा है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य की टीम तैयार करनी है, तो समय-समय पर नए खिलाड़ियों को भी अवसर देना जरूरी है।
रोटेशन नीति से मिल सकता है फायदा
पूर्व चयनकर्ता सरनदीप सिंह समेत कई क्रिकेट विशेषज्ञ मानते हैं कि रोटेशन नीति अपनाकर युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव दिया जा सकता है। भारतीय क्रिकेट पहले भी ऐसा कर चुका है। 2012 में सीनियर खिलाड़ियों को आराम देकर युवा खिलाड़ियों को अवसर दिया गया था, जिसका फायदा आगे चलकर टीम को मिला। मौजूदा दौर में भी लगभग सभी बड़ी टीमें भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसे फैसले लेती हैं।
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फैसला सिर्फ एक मैच का नहीं, भविष्य का भी
यह जरूरी नहीं कि वैभव सूर्यवंशी को मौका मिलते ही टीम हर मैच जीत जाएगी। लेकिन लगातार बेंच पर बैठाने से भी उनका विकास नहीं होगा। भारतीय क्रिकेट के कई महान खिलाड़ी अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मैच में बिना अनुभव के उतरे थे और बाद में इतिहास रचा। अब फैसला टीम मैनेजमेंट को करना है कि प्राथमिकता सिर्फ मौजूदा सीरीज जीतने की है या आने वाले वर्षों की मजबूत टीम भी तैयार करनी है।