देश की राजनीति में इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा राहुल गांधी की हो रही है। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उनसे उम्मीदें बढ़ीं, लेकिन बिहार के नतीजों ने एक बार फिर सवालों का तूफान खड़ा कर दिया। विरोधियों का आरोप है कि राहुल गांधी की लीडरशिप में कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही है। सबसे बड़ी समस्या पार्टी के अंदर की गुटबाजी है राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, कर्नाटक… लगभग हर बड़े राज्य में कांग्रेस के नेता आपस में ही भिड़ते रहे और राहुल गांधी समय रहते सख्त फैसले नहीं ले पाए। यहीं से विरोधियों को मौका मिलता है कि राहुल निर्णायक नेतृत्व नहीं दे पा रहे।
संदेश कमजोर, जनता तक नहीं पहुंची बात
दूसरी बड़ी चुनौती है राहुल गांधी का अस्पष्ट नैरेटिव। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार पर राहुल ने यात्राएं निकालीं, भाषण दिए, लेकिन जनता तक वह तेज़ और प्रभावी संदेश नहीं पहुंच पाया जिसकी आज राजनीति में मांग है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी का नैरेटिव विकास, राष्ट्रवाद और स्थिर नेतृत्व सीधा और असरदार होता है। राहुल की बातों में भावनाएं तो दिखती हैं, लेकिन भीड़ को ऊर्जा देने वाला, चुनावी माहौल बदल देने वाला प्रभाव कम दिखाई देता है।
चुनावी रणनीति में बार-बार चूक
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या उसकी चुनावी रणनीति मानी जा रही है। कई राज्यों में संगठन कमजोर, स्थानीय चेहरों की अनदेखी और गठबंधन देर से बनने जैसी गलतियां बार-बार दोहराई गईं। भारत जोड़ो यात्रा को चर्चा तो मिली, लेकिन जिन राज्यों में यह यात्रा चली, वहां चुनावी फायदा नहीं दिखा। उधर BJP चुनाव से महीनों पहले ही पूरा मशीनरी मोड में आ जाती है, जबकि कांग्रेस आखिरी दिनों में कैंपेन तेज करती है।
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पुरानी इमेज का बोझ और संगठन की थकान
चौथी बड़ी वजह राहुल गांधी की इमेज प्रॉब्लम है। विरोधियों ने सालों तक जो छवि बनाई, उसका असर आज भी सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में दिखता है। राहुल गंभीर मुद्दों पर बोलते भी हैं, विदेश नीति पर स्टैंड भी लेते हैं, संसद में आक्रामक भी दिखते हैं लेकिन पुरानी बनाई गई छवि मिट नहीं पा रही। साथ ही कांग्रेस का संगठन भी थका हुआ दिखता है। नए चेहरे, आक्रामक टीम और डिजिटल स्ट्रैटेजी की कमी लगातार पार्टी को कमजोर कर रही है। यही कारण है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस 3 लोकसभा और 63 विधानसभा चुनाव हारी, हालांकि कर्नाटक, हिमाचल और तेलंगाना जैसी जीतें भी दर्ज कीं।