शुक्रवार का दिन भारतीय मुद्रा बाजार के लिए बेहद भारी साबित हुआ। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर 91.95 तक फिसल गया। यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि बाजार में फैली घबराहट का साफ संकेत है। शेयर बाजार में कमजोरी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितता ने मिलकर रुपये को दबाव में डाल दिया।
अडानी ग्रुप की खबर से बाजार सहमा
रुपये और शेयर बाजार पर सबसे बड़ा झटका अडानी समूह से जुड़ी खबर से लगा। अमेरिका की सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने गौतम अडानी को लेकर अदालत से समन की अनुमति मांगी, जिसके बाद बाजार में डर फैल गया। अडानी ग्रुप के शेयरों में तेज गिरावट आई और इसका असर पूरे बाजार पर पड़ा। निवेशकों ने जोखिम से बचने के लिए बिकवाली शुरू कर दी।
डर के माहौल में डॉलर बना सुरक्षित ठिकाना
जब भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशक सुरक्षित विकल्प की तलाश में डॉलर की ओर भागते हैं। यही इस बार भी हुआ। जानकारों का कहना है कि अडानी से जुड़ी खबर ने डॉलर खरीदने की होड़ और तेज कर दी। जैसे-जैसे डॉलर की मांग बढ़ी, रुपया और कमजोर होता चला गया।
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विदेशी निवेशकों ने निकाला पैसा
रुपये पर सबसे ज्यादा असर विदेशी निवेशकों की निकासी का पड़ा। इस महीने अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 3.5 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। जनवरी में निफ्टी लगभग 5 प्रतिशत टूट चुका है। जब विदेशी निवेशक पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर हो जाता है।
आयातकों की मांग ने बढ़ाया दबाव
सिर्फ निवेशक ही नहीं, बल्कि सोना और दूसरे जरूरी सामान आयात करने वाली कंपनियां भी बड़ी मात्रा में डॉलर खरीद रही हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग और बढ़ गई है। नतीजा यह हुआ कि रुपये पर दबाव लगातार बना रहा और गिरावट रुकने का नाम नहीं ले सकी।
RBI की कोशिशें, लेकिन चुनौती बड़ी
भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को संभालने के लिए डॉलर बेचकर दखल दिया, लेकिन असर सीमित रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक विदेशी निवेशकों की निकासी नहीं रुकती, रुपये पर दबाव बना रहेगा। जनवरी में अब तक रुपये में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। साफ है कि आने वाले दिनों में रुपये की राह आसान नहीं होने वाली।