देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक खबर इन दिनों हर आम आदमी को परेशान कर रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया 91 के पार चला गया है और अभी तक गिरावट पर कोई ब्रेक लगता नहीं दिख रहा। पहले पेट्रोल-डीजल के दाम सुर्खियों में रहते थे, अब उनकी जगह गिरता रुपया ले चुका है। कई लोग कहते हैं कि हमें क्या फर्क पड़ता है, कमाई भी रुपये में है और खर्च भी रुपये में ही होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि रुपया जितना कमजोर होता है, महंगाई का बोझ उतना ही बढ़ता है। यही वजह है कि रुपये की गिरावट अब सिर्फ आंकड़ों की खबर नहीं, बल्कि हर घर की चिंता बन चुकी है।
आज़ादी से अब तक, रुपये की गिरावट का सफर
अगर इतिहास देखें तो आजादी के समय एक डॉलर करीब 3 रुपये 30 पैसे के बराबर था। 1966 में आर्थिक संकट के दौरान बड़ी गिरावट आई और डॉलर 7.50 रुपये तक पहुंच गया। 1991 के बाद आर्थिक सुधारों के दौर में डॉलर 20 रुपये के पार गया। 2000 से 2010 तक स्थिति कुछ हद तक स्थिर रही, लेकिन 2012 के बाद से रुपये की कमजोरी लगातार बढ़ती गई। अब 2025 के आसपास डॉलर 91 रुपये के करीब पहुंच चुका है, जो रुपये का अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। साफ है कि यह गिरावट अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का नतीजा है।
ये भी पढ़ें : अब लाइन नहीं, App बताएगा ब्रैंड, Delhi में शराब खरीद का गेम बदलेगा
रुपया क्यों गिर रहा, ये हैं बड़े कारण
रुपये की कमजोरी के पीछे कई वजहें हैं। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित देशों में लगा रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता भी रुपये पर दबाव बना रही है। इसके अलावा भारत तेल और सोने का बड़ा आयातक है और इनकी कीमतें डॉलर में चुकानी पड़ती हैं। रिजर्व बैंक भी इस बार ज्यादा दखल नहीं दे रहा और रुपये को बाजार के हिसाब से चलने दिया जा रहा है। इन सभी कारणों ने मिलकर रुपये को और कमजोर कर दिया है।

आपकी जेब पर असर और आगे क्या होगा
रुपया कमजोर होने का सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। विदेश से आने वाला हर सामान महंगा हो जाता है। पेट्रोल-डीजल, गैस, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ जाता है। यानी महंगाई धीरे-धीरे हर चीज में दिखने लगती है। हालांकि जो लोग विदेश में काम करते हैं या डॉलर में कमाते हैं, उन्हें फायदा होता है। सवाल यह है कि रुपया कहां रुकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो डॉलर 92 के पार भी जा सकता है। वहीं कुछ अनुमानों के अनुसार 2026 में स्थिति बेहतर हुई तो रुपया फिर मजबूत होकर 87 के आसपास आ सकता है। फिलहाल गिरते रुपये ने हर किसी को सतर्क कर दिया है।