Venezuela Earthquake: अमेरिकी देश वेनेजुएला में लगातार आए दो तगड़े भूकंपों ने भारी तबाही मचाई है। मलबे में तब्दील इमारतें और अपनों को तलाशते बेबस लोग आज के आधुनिक दौर में भी विज्ञान की लाचारी को बयां कर रहे हैं। इस तबाही के बीच हर किसी के मन में एक ही सवाल उठ रहा है, जब हमारे वैज्ञानिक अंतरिक्ष तक पहुंच चुके हैं और चक्रवात, आंधी या तूफान की जानकारी 3-4 दिन पहले ही दे देते हैं, तो आखिर धरती के नीचे आने वाले इस भूकंप के आगे वे लाचार क्यों हो जाते हैं? क्यों इसकी कोई सटीक भविष्यवाणी नहीं हो पाती है? आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
कैसे होती है मौसम की निगरानी
मौसम से जुड़ी हर आफत जैसे चक्रवात, आंधी या भारी बारिश खुले आसमान के नीचे होती है। आसमान में मौजूद सैटेलाइट और अत्याधुनिक रडार बादलों की हलचल, हवा की रफ्तार और वायुमंडलीय दबाव पर लगातार नजर रखते हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने का पूरा समय मिल जाता है कि कोई तूफान कब, कहां और कितनी ताकत से टकराएगा। इसके विपरीत, भूकंप का पूरा खेल जमीन के कई किलोमीटर नीचे होता है, जहां कोई कैमरा, रडार या सैटेलाइट नहीं देख सकता। इसीलिए मौसम का मिजाज समझना आसान है, लेकिन धरती का रोष नहीं।
क्यों नहीं लगा पाते पहले से भूकंप का अंदाजा
धरती के नीचे मौजूद प्लेट्स बहुत धीमी गति से खिसकती हैं। जब ये आपस में टकराती हैं, तो चट्टानों के बीच भारी दबाव बनता है। यह दबाव सालों-साल अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है और एक दिन चट्टानें अचानक टूट जाती हैं। यह पूरी प्रक्रिया इतनी गहराई में और इतनी अचानक होती है कि सतह पर बैठे वैज्ञानिकों को इस बात का पहले से अंदाजा नहीं लग पाता है। दुनिया में अभी ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो 2-4 दिन पहले इसकी सटीक जानकारी दे सके।
कैसे पकड़ में आती है तूफान और सुनामी
आंधी-तूफान जैसी मौसम प्रणालियां बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती हैं, इसलिए उनके रास्ते को ट्रैक करना आसान होता है। अगर सुनामी की बात करें, तो वह ज्यादातर भूकंप के बाद आती है। जब समुद्र के नीचे भूकंप आता है, तो पानी की विशाल लहरों को तट तक पहुंचने में कुछ मिनट या घंटों का समय लगता है। वैज्ञानिक इसी समय का फायदा उठाकर तटीय इलाकों में अलर्ट जारी कर देते हैं, जिससे लोगों की जान बचाई जा सकती है।
भविष्यवाणी और त्वरित चेतावनी में अंतर
वैज्ञानिक भले ही ये नहीं बता पाते हैं कि कल सुबह किस शहर में भूकंप आएगा, लेकिन पुराने इतिहास को देखते हुए वे यह जरूर बता सकते हैं कि कौन सा इलाका कितना संवेदनशील है। इसे भूकंप का पूर्वानुमान कहा जाता है। इसके अलावा आजकल अर्थक्वेक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इस दौरान जब भूकंप आता है, तो हले नुकसान न पहुंचाने वाली तेज तरंगें निकलती हैं। जमीन के अंदर लगे सेंसर इन्हें तुरंत पकड़ लेते हैं और तबाही मचाने वाली मुख्य तरंगों के पहुंचने से कुछ सेकेंड या मिनट पहले अलार्म बजा देते हैं। जिससे लोगों को बचने का कुछ समय मिल सकता है, लेकिन ये मौसम की तरह 3-4 दिन पहले से भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं।