साल की शुरुआत में ही दुनिया के सामने एक नया सैन्य संकट खड़ा हो गया जब अमेरिका ने वेनेजुएला पर सीधा हमला कर दिया। अमेरिकी सेना ने राजधानी काराकस समेत चार बड़े शहरों पर मिसाइलें दागीं और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया गया। मादुरो को उनकी पत्नी के साथ अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है। इस अचानक कार्रवाई ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है और सवाल उठने लगे हैं कि आखिर अमेरिका ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया।
तेल से शुरू हुआ पुराना विवाद
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच टकराव की जड़ें काफी पुरानी हैं। वेनेजुएला के पास कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है, जिस पर दशकों से वैश्विक शक्तियों की नजर रही है। 1922 में तेल मिलने के बाद अमेरिका समेत कई देशों ने यहां भारी निवेश किया। लेकिन 1976 में राष्ट्रपति कार्लोस आंद्रेस पेरेज ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया और विदेशी कंपनियों की संपत्तियां सरकारी कंपनी PDVSA को सौंप दी गईं। यहीं से अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्तों में स्थायी तनाव की शुरुआत हो गई।
शावेज से मादुरो तक टकराव
1998 में ह्यूगो शावेज के सत्ता में आने के बाद वेनेजुएला ने अमेरिका से दूरी बढ़ाई और क्यूबा, रूस व चीन के करीब गया। अमेरिका ने इसे अपने प्रभाव क्षेत्र के लिए खतरा माना। शावेज के बाद सत्ता संभालने वाले मादुरो के कार्यकाल में आर्थिक संकट गहराया। महंगाई, बिजली संकट और पलायन ने देश को झकझोर दिया। 2019 में मादुरो के चुनावों को अवैध बताकर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने विपक्षी नेता जुआन गुआइदो को अंतरिम राष्ट्रपति मान्यता दी। इसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ते चले गए।
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ट्रंप की रणनीति और तेल की भूमिका
हाल के वर्षों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई। मादुरो को ड्रग तस्करी से जोड़कर देखा गया और समुद्र में कई जहाजों को निशाना बनाया गया। अमेरिका ने वेनेजुएला के पास युद्धपोत तैनात किए और सैन्य दबाव बढ़ाया। मादुरो का आरोप है कि अमेरिका का असली मकसद दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर कब्जा करना है। विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस–यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच वेनेजुएला का तेल अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हो गया है।