
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग पर दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह याचिका अधिवक्ता डॉ. सुनीता शर्मा ने दाखिल की थी, जिसकी सुनवाई की मांग वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की पीठ के समक्ष की। याचिका में कहा गया है कि वोट देने का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है और इसे किसी भी नागरिक से छीना नहीं जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 326 में हर वयस्क नागरिक को मताधिकार की गारंटी दी गई है, लेकिन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62(5) जेल में बंद सभी व्यक्तियों को मतदान से वंचित करती है — चाहे वे दोषी सिद्ध हुए हों या नहीं।
निर्दोष कैदियों के अधिकार पर सवाल
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि देश की 1,330 जेलों में करीब 4.5 लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से 75% से अधिक विचाराधीन हैं — यानी उनका दोष अभी सिद्ध नहीं हुआ है। ऐसे लोगों को वोट देने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया कि भारतीय दंड संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो विचाराधीन कैदियों को मताधिकार से वंचित करता हो। निर्वाचन आयोग की 2016 की रिपोर्ट में भी ‘नो वोटर टू बी लेफ्ट बिहाइंड’ मिशन के तहत जेलों में मतदान केंद्र बनाने और डाक मतपत्र की सुविधा देने की सिफारिश की गई थी।
अन्य देशों का उदाहरण और कोर्ट से मांगें
याचिका में बताया गया है कि कनाडा, ब्रिटेन और पाकिस्तान जैसे देशों में विचाराधीन कैदियों को मतदान की अनुमति है, जबकि भारत में यह अधिकार पूरी तरह से नकारा गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि सरकार और संसद को निर्देश दिया जाए कि किन अपराधों में दोषी पाए जाने पर अस्थायी रूप से मतदान प्रतिबंधित किया जा सकता है, ताकि एक समान रोक न रहे। साथ ही, जेलों में मतदान केंद्र स्थापित करने और प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) में संशोधन की भी मांग की गई है, ताकि निर्दोष कैदियों का लोकतांत्रिक अधिकार बहाल हो सके।