दिल्ली में यमुना को लेकर सालों से सवाल उठते रहे हैं। हर सरकार पर यही आरोप लगा कि नदी कागजों में तो साफ होती है लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने यमुना को लेकर अफसरों को सीधे मिशन मोड में उतरने का आदेश दे दिया है। सचिवालय में हुई हाई लेवल बैठक के बाद साफ संकेत मिल गया कि अब यमुना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं बल्कि सरकार की साख से जुड़ चुका है।
सीवेज पर सबसे बड़ा फोकस
रेखा गुप्ता ने साफ कहा कि यमुना सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि दिल्ली की जीवनरेखा है। अगर यही बीमार रहेगी तो शहर कैसे स्वस्थ रहेगा। इसी सोच के साथ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ाने का फैसला लिया गया है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में रोज 1500 एमजीडी गंदा पानी साफ किया जाए। इसके लिए पुराने प्लांट सुधारे जाएंगे और नए छोटे बड़े प्लांट लगाए जाएंगे। मकसद साफ है कि बिना ट्रीटमेंट कोई भी गंदा पानी यमुना में न गिरे।
हर घर सीवर से जुड़े बिना समाधान अधूरा
सरकार मानती है कि जब तक अनधिकृत कॉलोनियों और जेजे क्लस्टर्स के घर सीवर नेटवर्क से नहीं जुड़ेंगे तब तक यमुना को साफ करने की बात अधूरी रहेगी। इसी वजह से सीवर लाइन बिछाने के काम में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं। हजारों कॉलोनियों में चरणबद्ध तरीके से सीवर नेटवर्क पूरा करने की योजना बनाई गई है। रेखा सरकार इस कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाने की कोशिश में जुटी दिख रही है।
नालों पर ड्रोन और सख्त निगरानी
नालों को लेकर इस बार सरकार ने सख्त और तकनीकी रुख अपनाया है। ड्रोन सर्वे के जरिए नजफगढ़ और शाहदरा जैसे बड़े नालों से जुड़े छोटे नालों की पहचान की जा रही है। हर महीने पानी की जांच होगी ताकि यह साफ हो सके कि प्रदूषण कहां से आ रहा है। सरकार का कहना है कि जब तक गंदगी के स्रोत को नहीं रोका जाएगा तब तक यमुना को बचाना नामुमकिन है।
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पड़ोसी राज्यों से तालमेल बड़ी चुनौती
इस पूरी योजना का सबसे संवेदनशील पहलू हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आने वाला दूषित पानी है। नजफगढ़ और शाहदरा ड्रेन के जरिए भारी मात्रा में गंदा पानी यमुना में पहुंचता है। मुख्यमंत्री ने साफ कहा है कि इस मुद्दे पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की जाएगी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर यहां तालमेल बन गया तो रेखा सरकार को बड़ी कामयाबी मिल सकती है।
जमीन पर उतरेगा प्लान या फिर वही कहानी
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह ब्लू प्रिंट जमीन पर उतर पाएगा या फिर पिछली योजनाओं की तरह फाइलों में सिमट जाएगा। विपक्ष भले ही पुराने वादों की याद दिला रहा हो लेकिन सरकार का दावा है कि इस बार निगरानी सिस्टम और जिम्मेदारी तय होगी। अगर तय समय में नतीजे दिखे तो यमुना सच में दिल्ली की जीवनरेखा बन सकती है। और अगर नहीं तो यही मुद्दा रेखा सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा।